ठाकुरदास घड़ी(thakurdas gadi)part5

स्वामी जो बहा से घोड़ा गाड़ी में चढ़कर पारौल गये और एक दिन भारील रहकर ८ जौलाई, सन् १८८० को
मेरठ चले गये।

मैनपुरी के मंगल समाचार

(१ जुलाई, सन् १८८० से ६ जुलाई सन् १८८० तक)
३० जून सन् १८८० को स्वामी जी फर्रुखाबाद से चलकर १ जौलाई, सन् १८८० को ६ बजे प्रातःकाल मैनपुरी
में शोभित होकर करमल दरवाजे के बाहर, थानसिंह लोहिया के बाग में ठहरे । यह समाचार सुन हजारो नगर निवासी,
उस समय से लेकर रात्रि के ११ बजे तक परमानंद पूर्वक दर्शन की इच्छा कर आते-जाते रहे और प्रमोद से परस्पर वार्तालाप
आदि द्वारा किती क हरषत करते रहे । लोगों के संदेह निवृत होने से जो उन्हें आनन्द होता था वह मानो इस वाक्य के
अनुसार का जन्म दाखवा मानो नवनिधि पाई।

पंडित तोताराम जी वर्णन करते हैं-*बहां शिष्टजन यह कहते फिरते थे कि जैसा कुछ आनन्द हम पहले के
ष मुनिया के समागम का सुनते आये हैं, वह प्रत्यक्ष देख लिया। इस अपूर्व मूर्ति को धन्य है ।" इस प्रकार आनन्दपूर्वक
दो दिन ्यतीत हो गये।

तीसरे दिन ० ३ जुलाई सन् १८८० को पांच बजे सायंकाल एक बड़े लम्बे-चौड़े अकटगंज नामक स्थान में
व्याख्यान का आरम्भ हुआ। यह व्याख्यान धर्म विषय पर था । यद्यपि उस दिन बादल थे परन्तु बड़े-बड़े सेठ साहकार और
अच्छे-अच्छे रस शासक और अफसर तथा पदाधिकारी लोगों और अन्य श्रोताओं को बड़ी भीड़भाड़ थी ।

लगभग एक हजार मनुष्य होंगे । उस समय का प्रबंध भी प्रशंसनीय था अर्थात् आरम्भ से समाप्ति तक कोई
किसी प्रकार का कोलाहल नहीं हुआ क्योंकि सभा के प्रबन्धकर्ता साहब कलेक्टर बहादुर थे। जज महाशय की यह अवस्था
देखने में आई कि व्याख्यान के आरम्भ से समाप्तिपर्यन्त दो घंटे तक निरन्तर चित लगाकर सुनते रहे । अन्य किसी ओर
कोई ध्यान न दिया।

४ जौलाई सन् १८८० को भी यही अवस्था रही। उस दिन आकाश स्वच्छ धा इसलिए पहले दिन से दगने
मनुष्य थे। यह व्याख्यान ईश्वर विषय में हुआ। सभा की समाप्ति पर सब लोग सब प्रकार से धन्यवाद देते हुए घरों को
यह कहते जाते थे कि जैसी स्वामी जी की प्रतिष्ठा पहले से सुनते थे वैसी ही देखने में आई ।

५ जौताई, सन् १८८० का दिन शंकासमाघान के लिए रखा गया था ताकि जो कछ दो दिन में शंका उत्पन्न हुई
हो वह निक्रत को जावे। उस दिन लोगों ने अपनी-अपनी समस्याओं का समाधान कराया । लोग स्वामी जी से फिर व्याख्यान
देने के लिए बहुत कहते रहे और इसके साथ ही समाज स्थापित करने की भी इच्छा प्रकट की परन्तु स्वामी जी एक आवश्यक
आम के कारण अधिक न ठहर सके और ६ जुलाई सन् १८८० को मेरठ की ओर चले गये और समाज स्थापित करने के
तो पीठ तोताराम जी को पीछे छोड़ गए। जब तक वहां रहे लगभग सौ सवा सौ मनुष्य हर समय प्रश्न, दर्शन और
उपदेश अर्थ उपस्थित रहते थे।

११ जुलाई, सन् १८८०, रविवार को समाज स्थापित हुआ और उस दिन से निरन्तर जारी है। (भारत
सुदा प्रवर्तक संख्या १३, जुलाई सन् १८८० पृष्ठ ८ से ११ तक)।

Thomas

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