ठाकुरदास घड़ी(thakurdas gadi)part3

लखनऊ नगर का वृत्तान्त

(५ मई, सन् १८८० से १९ मई, सन् १८८० तक)
स्वामी जी बनारस से चलकर लखनऊ पधारे । पंडित यज्ञदत्त शास्त्री ने प्रयाग में न किया कि जिन दिना
मैं गंगाधर शास्त्री के पास लखनऊ में पढ़ता था तो एक दिन मेरा रामानुज मतानयायी पडित बिशनदत से (जो भागवत
जानता था) 'अतप्ततनु के अर्थ पर झगड़ा हुआ मैने कहाकि चल तेरा स्वामी जी से सन्तोष करा द,जिस पर हम दोनों
आये। स्वामी जो उस समय हिडोले के नाके पर एक बाग में उतरे हुए थे और आमों की ऋतु थी। स्वामी जी उस समय

भजन कर रहे थे । हम ने जाकर कहा कि महाराज ! 'अतप्ततन् का यह रामानुजी पंडित शरीर को जलाना अर्थ करता है
और मैं कहता है कि ऐसा नहीं है। कहा कि हम भोजन कर लें। फिर भोजन करने के पश्चात् थोड़ा सा टहले और कहा कि
भाजन कृलता शतपदं गच्छेत' अर्थात भोजन करक सौ पग चले। फिर थोड़ा सा लेटकर पलंग पर बैठकर नौकर को कहा
कि वेद लाओ। वह लाया, स्वामी जी ने वह मंत्र निकाला(शगवेद मंडल २,सूक्त ७३,मन्त्र १,२) और अर्थ करके बतलाया
और साथ ही कहा कि यदि तुम हमारा अर्थ न मानो तो तुम्हारा सायण भी ऐसा ही अर्थ करता है । फिर वहां क्या करोगे ?
"अतप्ततनु;-इस मन्तर का अभिप्राय जप यम नियम आदि करना है, शरीर का जलाना उसका अर्थ नहीं है परन्तु पंडित
बिशन दत्त फिर भी हठ करता रहा।

फिर स्वामी जी ने तरबूज चोर कर सब को बांट दिया। उस रामानुजी ने कहा कि तुलसी का पता हो तो हम खावे ।
स्वामी जी ने कहा कि तुम्हारा बकरी का स्वभाव नहीं जाता? उसने कहा कि यह तो अच्छा है। स्वामी जी ने कहा कि रोग
के लिए; न कि सब समय । सब समय चवाना तो प्रत्यक्ष पशुपन है और कुछ नहीं ।इस के खाने में कुछ माहात्म्य नहीं।'
पहले स्वामी जी ने एक बार सत्यप्रकाश पाठशाला* भी स्थापित की थी जिस में हम ने प्राज्ञ तक पढ़ा, फिर कालिज
में चले आये। बहुत समय हुआ यह शाला बन्द हो गई है।

फर्रुखाबाद नगर का वृत्तान्त

(२० मई, सन् १८८० से ३० जून, सन् १८८०तक)
आर्य समाज की अंतरंग सभा पर नियन्त्रण रखने के लिए 'मीमांसक सभा' स्थापित की पंडित गोपालराव
हरि जी वर्णन करते हैं-"सातवी बार अर्थात् अन्तिम बार श्री स्वामी जी महाराज संवत् १९३७ के अर्ध वैशाख मास में
यहां आये और डेढ़ मास रहकर मैनपुरी होते हुए मेरठ को चले गये। इस अवसर में आर्यसमाजी पुरुषों का संयोग-वियोग
कुछ हुआ। यहां का धर्मानुकूल कार्य चलने के अर्थ अन्तरंग सभा के ऊपर उन्होंने 'मीमांसक सभा स्थापित की । बहुत से
व्याख्यान यहां और फतहगढ़ में दिये और इसी अवसर पर धर्मसभा वालों के पंडित उमादत्त जी से, मुख्यतया शास्त्रार्थ होने
के अर्थ, यथेच्छ लिखा-पढ़ी भी हुई । राजा शिवप्रसाद कृत निवेदनपत्र का मुंहतोड़ उत्तर भी दिया गया।

ला0 जगन्नाथ जी, रईस फर्रुखाबाद ने वर्णन किया--"वे संवत् १९३७ में आये । इस बार बहुत से व्याख्यान
दिये । सम्भवत:, समाज के मकान में तीन, माधोराम की बाड़ी में दो और कैम्प फतहगढ़ में बाबू गौरीलाल के बंगले पर
तीन व्याख्यान दिये । अन्त को जब चलने लगे तो और लोगों और बाबू दुर्गाप्रसाद जी ने कहा कि आप आज न जावें ।
स्वामी जी ने कहा कि हम आज अवश्य जावेंगे । डाकगाड़ी की खोज की गई। स्वामी जी ने कहा कि हम पैदल चले जावेंगे
और सवेरा मैनपुरी में करेंगे,होंगे नहीं। वह प्रोग्राम को तोड़ना नहीं चाहते थे और लोग प्रेम से रखना चाहते थे। जिस पर

Thomas

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