ठाकुरदास घड़ी(thakurdas gadi)part2

और यदि जाता तो घोड़ों के समान बाहर खड़ा रहकर सुनता और फिर चला जाता । वह बहुत चाहता था कि मैं
के मुखारविन्द से कुछ सन्।। कई बार यल किया परन्तु असफल हुआ। अन्त में उसे विदित हआ कि स्वामी ।
तीन-चार बजे निकल जाया करते हैं। एक रात जिधर स्वामी जी जाया करते थे वह उधर जाकर पहले ही बेटा
स्वामी जी लौटकर दानापुर से पूर्व नहर के तट पर आ रहे थे तब वह उन के पीछे-पीछे चला । मार्ग में स्वामी जी ३
पूछा कि तुम कौन हो और क्या चाहते हो ? उस ने कहा कि मैं यहां का ही निवासी हैं परन्तु बिरादरी के भय से आ
व्याख्यान सुनने लोगों के सामने नहीं आ सकता। आपसे बातचीत करने की बहुत इच्छा है। यही बातें करते-करते
जी बगले के द्वार पर पहुंच गये तब पता कि तुम्हारा अभिप्राय क्या है ? उस ने कहा, कि महाराज | मेरी यह श्रदा
'आप अपने चरण को मेरे मस्तक पर लगा दीजिये। स्वामी जी ने कहा कि इस का क्या फल होगा और किसी बात
इच्छा हो तो कहो, अन्यथा हम जाते हैं। किसी समय आकर पूछ लेना।' उस ने कहा कि अवश्य किसी समय उपनि
हंगा परन्तु इस समय मेरो यह श्रद्धा है। अन्त में स्वामी जी ने उसके हठ करने पर कहा कि 'इस से होगा तो कुछ नहो: पत्र
यदि तू चाहता है तो ले और अपने पांव का अंगूठा उस के मस्तक पर लगा दिया और वह चला गया। यह बात मग्री
उसने स्वयं सुनाई थी।

*जिन दिनों स्वामी जी बिहार प्रदेश के दानापुर नगर में उपदेश दे रहे थे तो किसी ने झूठमूठ ‘इण्डियन मिरर' के
सम्पादक को कहा कि स्वामी जी ने किसी पत्थर की मूर्ति पर लात मारी, जिससे लोगों में बुरा प्रभाव हुआ और उन्होंने
उपदेश में आना बन्द कर दिया। यह समाचार उसे समाचार पत्र में इन शब्दों में लिखा है
('इण्डियन मिरर' से उदत) आशा है कि हमें यह समाचार सही नहीं मिला कि पंडित दयानन्द सरस्वती लोगो।
के धार्मिक विश्वासों का उल्लेख सम्मान पूर्वक नहीं करते। कहते हैं कि बिहार के एक कस्बे में स्वामी जी ने हिन्दुओं की
एक पत्थर की मूर्ति पर लात मारने की इच्छा प्रकट की थी । हमको विदित है कि इस कार्यवाही से लोगों पर बुरा प्रभाव
हुआ और परिणाम यह हुआ कि लोग उनका उपदेश सुनने से हट गये । एक हिन्दु मूर्तिभंजक और एक जोशीले ईसाई
प्रचार में थोड़ा ही अन्तर है, इसलिए आश्चर्य की बात नहीं है कि लखनऊ विटनेस' (Lucknow witness) नामक
समाचारपत्र में यह वाक्य प्रकाशित हुआ-"जो ब्राह्मणों को सय के सामने देश का अत्यन्त अशुभचिन्तक कहा जाता है
और उन के पापों को प्रकट किया जाता है और उनको निरन्तर दण्डनीय घोषित किया जाता है, तो जो प्रतिष्ठा इस सम्प्रदाय
को शताब्दियों से प्राप्त है, उसमें बड़ी भारी कमी हो जाती है। अपने देश के बड़े भारी (महत्वपूर्ण) सम्प्रदाय के विषय में
ऐसे कटु वचन कहने से हम ईश्वर की शरण मांगते हैं। भलाई करना कुछ और ही है ।*(२ दिसम्बर, सन् १८७९, खंड
१९. संख्या २९७, रविवार)

परन्तु यह झूठा आरोप है । किसी मूर्ख ने शरारत करने के लिए यह झूठी सूचना भेजी। स्वामी जी ने कदापि
ऐसा नहीं किया और उनके व्याख्यानों से कोई अप्रसन नहीं हुआ। सब लोग व्याख्यान अत्यन्त उत्साह से सुनते रहे और
पडित गोविन्द आदि जो शुरु से ही बड़े कट्टर मूर्तिपूजक और चतुर्भुज जी के सहायक थे, मूर्तिपूजा की वास्तविकता।
और स्वामी जी के सत्य उपदेशों के कारण उसी दिन से आर्यसमाज के समर्थक बन गये जो अब कलकत्ता आर्यसमाज के
सभासद् और वैदिक धर्म के बड़े प्रेमी और उत्साही सदस्य हैं। कई स्थानों पर ऐसे निर्मुल समाचार स्वामी जी के विषय
में लोगों ने प्रकाशित कराये ।

अन्त में स्वामी जी २ दिन वहां सत्योपदेश करके कार्तिक सदि 9 गुरुवार तदनुसार १९ नवम्बर को है।
से चलकर उसी दिन बनारस में आ विराजमान है और महाराजा विजयनगर के आनन्द बाग में निवास किया।

Thomas

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