ठाकुरदास घड़ी(thakurdas gadi)

दवन से ज्ञात हुआ कि दो पंडित इस नगर में आये हुए है। दोनों की धार्मिक विचारधारा दो प्रकार की है। अपनी-अपनी
धार्मिक विचारधारा के अनुसार चलने वाले बहुत से लोग दोनों पडितोें को सहादता कर रहे हैं। दोनों पंडितो में उनकी
अपनी-अपनी धार्मिक विचारधारा को लेकर परस्पर सभा-रासार्य होने की बात चल रही है। दोनों की धार्मिक मान्यता
तथा बातचीत के विरोध होने के कारण किसी पर घटना के घटित होने की आशय है। इस कारण तुम लोगों को तया
कानपुर के रहने वाले ग्रसरन प्यारेलाल बाबलाल तथा नन्दलाल को लिखा जाता है कि यदि सभा के करने अथवा शास्त्रार्थ
में किसी प्रकार का कोई झगड़ा बखेड़ा उत्पन्न हुआ तो तुम लोगों पर इसका उततरदाबित्व होगा। पुन ताकीद की जाती है।
१० नवम्बर सन् १८७१*

"इसके दो दिन पश्चात् जब हम सौदागरसिंह झकरोगिरि गुसाईं के शिवालय में बैठे हए वे तो उस समय
गोविन्द सरन् रामकिशन और परमेश्वरी स्त्रियों तथा चार अन्य मनुष्यों सहित वहां आये । हमने चटाई देकर बिटलाया।
उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ होना चाहिए। हमने कहा कि स्वीकार है । तब कहा कि कोई स्थान बताओ । हमने उमाचरण
बंगाली का मकान बतलाया और कहा कि टिकिट (प्रवेश-पत्र दिये जाये और प्रबन्ध सरकारी हो। दोनों ओर के मन्त्री
जितने चाहे उतने ही मनुष्य दोनों ओर से समान संख्या में हो। उसने कहा कि बाहर का उतरदायित्व कौन लेगा? वह हमने
अपने ऊपर लिया । तब कहा कि वहां नहीं, सार्वजनिक स्थान पर हो। हम ने कहा कि ऐसा स्ान राजा का बंगला है।
उन्होंने वहां से भी इन्कार किया, तब हमने कहा कि तुम्हारी इच्छा कहां है? कहा कि उस शिवालय के पास मैदान में जहां
खलिहान है। हम ने कहा कि इस को एक और शराबखाना और दूसरी ओर ताड़ीखाना है जिस में तीन-चार हजार बदमाश
इकड़े हो सकते हैं और ऐसे ही लोग वहां रहते हैं। वहां कौन भला मनुष्य जावेगा । तुम्हारी इच्छा उपद्रव कराने की प्रतीत
होती है।
। “एक नवाब दूसरे डॉक्टर नजीर खां और पंडित बशीर मिश्र ये सज्जन प्राय: प्रतिदिन व्याख्यानों में जाया करते
थे । पहले दोनों सज्जनों को मुसलमानों ने बहुत तंग किया कि तुम उनके व्याख्यानों की प्रशंसा करते हो? परन्तु वे न्यायप्रिय
होने के कारण सत्य से न हटे।*

ठाकुरदास घड़ी बनाने वाले ने कहा-हम भी चतुर्भुज की ओर मे सन्देश लाया करते थे। स्वामी जी ने कहा
कि हमारे सामने आकर मूर्तिपूजा का प्रमाण दे तो हम उनको पांच सौ रुपया पुरस्कार देंगे। हमने जाकर उनसे कहा। उन्होंने
उनर दिवा कि भाई ! हम नहीं जा सकते।

अष का अमर्ष और सांप–एक हलवाई थानचन्द भगत भी उन दिनों चतुर्भुज शर्मा ॐ ओर से सीख्-साख कर
स्वामी जी से मूर्ति पूजा पर विवाद किया करता और बकवास भी बहुत करता था। वह बड़ा चतुर मनुष्य था। एक दिन
स्वामी जी ने उस को कहा कि तू हमको नित्य तंग करता और हमारा समय व्यर्थ नष्ट करता है। ऐसा न कर अन्यथा तेरा
अपंग हो जावेगा क्योंकि वेद में मूर्ति पूजा कदापि नहीं है, ऐसा करना महापाप है। जिस पर वह क्रोधित होकर कछ बोला
और चला गया। उसको हमने अपनी आत से देखा कि वह गलित कोढ़ी होकर इस झगड़े के दस बारह दिन पश्चात मर
गया। सब कोई जानते हैं कि उसकी यह दशा हुई।

‘हरिहर क्षेत्र पर जाने का परामर्श होता रहा और राय वहादुर बाबू महावीरप्रसाद जी ने अपने मनुष्य भी नियत
कर दिये परन्तु नियमित रूप से टोक प्रवन्ध न होने के कारण स्वामी जो वहां नहीं गये।
बाबू मणिलाल सदस्य, आर्य समाज दानापुर ने वर्णन किया-"एक व्यक्ति दर्गावस्या ब्राह्मण जो स्टाम्प बेचता
था और पुराना दानापुर का रहनेवाला था अपने जाति-भाइयो के भय से स्वामी जी के व्याख्यान में नहीं जाया करता

Thomas

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