प्राचीन संस्कृत(sanskrit)part5

आ और पूर्ववत् डरते रहे । तब स्वामी जी ने कहा कि आप इजील पर आक्षेपों के होने से क्यों इतना घबराते हैं? लीजिये।
पहले आप वेद पर दस प्रश्न तक कर लीजिये और उत्तर सुनने के पश्चात् मुझ को इजोल पर आक्षेप करने की आज्ञा दीजिये।
ताकि सुनने वालों को आनन्द आवे, सत्य और झूठ को वास्तविकता प्रकट हो जावे । भला यह कहा की रोति है कि आप
अपनी के जावें और दूसरे को न सुने । इस पर पादरी साहब को भीड़ की लज्जा ने रोका और तब उन्होने विवश होकर
कहा कि बहुत अच्छा ! परन्तु जिस समय इन्जोल पर आक्षेप किये जाने की घड़ी आई और लिखने की अवस्था उत्पन्न हुई।
तब तो पादरी साहब की विचित्र दशा हुई अर्थात् वही मुसलमान लोगों की सी रट लगाये गये जाते थे कि जब तक हम
अपने प्रश्न के उत्तर से सन्तोष प्राप्त न कर लेंगे और उसकी स्वीकृति न दे देंगे तब तक न हम तुमको बोलने देंगे और न
तुम्हारी सुनेंगे। यह देखकर स्वामी जी ने कहा कि आप अपने प्रश्नों के विषय में तो कहते हैं परन्तु मेरे प्रश्नों के विषय में
भी इस बात को स्वीकार करते हैं? तो बस नहीं के अतिरिक्त और क्या उत्तर था क्योंकि यह सारा बखेड़ा तो अपना
बड़प्पन दिखाने और झूठ-मूठ का यश लूटने के अभिप्राय से था। शास्त्रार्थ से तो पूर्णतया इन्कार ही था। जब स्वामी जी
ने पादरी साहब को अन्तिम नहीं का उत्तर सुना तो यह कहा कि पादरी साहब ! आप न्याय से काम बिलकुल नहीं लेते;
केवल शास्त्रार्थ का नाम करते हैं परन्तु आप की यह चतुराई कि कहीं पोल न खुल जाये व्यर्थ गई और आपकी सारी
वास्तविकता प्रकट हो गई क्योंकि आप उन नियमों को जो शास्त्रार्थ में आवश्यक होते हैं, स्वीकार नहीं करते और न दूसरे
को सुनना चाहते हैं । देखो, में पहले भी कह चुका हूं और फिर भी कहता हूं कि प्रथम आप वेद पर एक से लेकर दस तक
आक्षेप कीजिये और मुझसे उत्तर लीजिये और तत्पश्चात् मुझको अपनी इजौल पर आक्षेप करने दीजिये और उत्तर प्रदान
कीजिये और जब आप मेरे आक्षेपों का उत्तर दे चुके तो फिर आप चाहे और नये दस प्रश्न मुझ पर कीजिये, चाहे अपने
पहले दस प्रश्नों में से यदि किसी में कोई सन्देह शेष रहे और मेरे उतर से इच्छानुसार सन्तोष न हो तो
वह
पूछिये और फिर
उतर सियेताकि सभा में उपस्थित लोग भी जान ले कि सत्य क्या है और असत्य क्या है ? सारांश यह कि जब पादरी
साहब के पास कोई और बहाना अवशिष्ट न रहा तो यह कहा कि या तो आप केवल मेरा ही सन्तोष कीजिये और अपने
आक्षेपों को रहने दीजिए अन्यथा में जाता है, आप बैठे रहिये । इस पर स्वामी जी ने कहा कि पादरी साहब ! इस सभा में
उपस्थित लोग तो आप के बार-बार भागने और किसी शर्त पर न जमने से भली भांति जान ही गये है कि आप इज्जील पर
आक्षेप होने से थरथर कांपते हैं और पीछा छुड़ाने के लिए बार-बार कूदते-फांदते फिरते हैं। खर, अब आप जाने और
आपका काम । अच्छा तो यही था कि आप शास्त्रार्थ करते और अपने जी की भड़ास निकाल लेते। यह सुनकर पादरी साहब
कठोर शब्दों में कहा कि बस आप उत्तर देते ही नहीं, में जाता हूं । मुझे काम है। इस पर स्वामी जी ने भी कहा कि आप
प्रश्न का उत्तर लेते ही नहीं क्योंकि आपका प्रयोजन तो कुछ और ही है, शास्त्रार्थ का तो केवल नाम है। अच्छा जाइये, मुझ
को इस समय काम है।

विचारणीय बात है कि ऐसी कार्यवाहियों से भला कभी शास्त्रार्थ होने की सम्भावना रहती है और कहीं इस प्रकार

सत्यासत्य का विवाह हो सकता है ? कदापि नहीं। यह बात किसी को स्वीकार नहीं होसकती कि हम तो आक्षेप करे और
दूसरे को आक्षेप करने न दे। अपनी कहें, दूसरे की न सुने । परन्तु वास्तविकता तो यह है कि जिस बात से किसी का सिद्धान्त
निबल होता है उसको स्पष्ट करने का वार्तालाप करने के लिए कौन उद्यत हो सकता है ! और जो पुस्तक आदि से अन्त तक
आक्षेप के योग्य हो, उस की निर्दोषता पर शास्त्रार्थ करना कौन स्वीकार कर सकता है? यदि आक्षेप करने वालों की धार्मिक
पुस्तके सच्ची और आक्षेप योग्य बातों से रहित होती तो क्या इस अभिप्राय से कि इन पर शास्त्रार्थ न हो इतना छल-कपट
किया जाता और बीसियों प्रकार की बनावटें बनाई जाती । यही न मान लेते कि बहुत अच्छा, पहले आप प्रश्न कीजिए

Thomas

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