प्राचीन संस्कृत(sanskrit)part4

पूरन सिंह सौदागर को दुकान के समीप दोनों पक्षों के लिए निकट और उपयुक्त स्थान है, शासाथ्थ किया जावे और उसको
सत्यासत्य के निर्णय का स्थान गिना जावे । वहां सत्यासत्य का निर्णय हो और यदि आप को यह आशंका हो कि कदाचित
यहां सभा में से कोई व्यक्ति आप सज्जनों के प्रति असभ्य वचन कहेगा अथवा हंसी-ठट्ठा करेगा तो इसका उत्तरदायित्व
इस
ओर के प्रबंधक आप के संतोष अर्थ लेने को तैयार है और यदि आप लोग मुझ को ही अपने पास सम्मानार्थ अघवा
और किसी कारण बुलाना चाहते हैं तो मुझको इसमें भी आपत्ति नहीं परन्तु शर्त यह है कि मैजिस्ट्रेट साहब का प्रबन्ध हो
क्योंकि जहां कहीं मैंने पौराणिक मत वालों से उनके पास जाकर शास्तार्थ किया है वहां कटुवचन बोलने की तो वात ही क्या
नाना प्रकार के उपद्रव तक भी उनकी ओर से हुए हैं और आपस का सारा प्रबन्ध उन्होंने समाप्त कर दिया है।

| अत्यंत खेद की बात है कि पण्डितो की ओर से इसका कोई उत्तर न मिला, मानो उत्तर का न आना ही उत्तर हुआ
कुछ दिनों पश्चात् कई एक सज्जनों ने स्वामी जी से कहा कि यदि आप एक सप्ताह ठहरे तो हम रामलाल नामक एक
पण्डित को, जो अत्यन्त चतुर और विद्वान् है शास्त्रार्थ के लिए बुलावे । इस पर स्वामी जी ने उत्तर दिया कि आप उनको
बुलाइये, मैं दो मास तक ठहर सकता है। इसके पश्चात् न कोई आया न गया, केवल व्यर्थ की बातें इधर-उधर मिलाते फिरे
ताकि साधारण लोगों में मख उज्ज्वल रहे परन्तु कहां तक ?

इसके पश्चात् मुहम्मदी लोगों की ओर से एक लेख द्वारा छेड़छाड़ हई परन्तु शास्ार्थ किस का, बातचीत कैसी ?
वहां तो केवल जग दिखावा और आत्मप्रदर्शन था। उनके हर आग्रह का सार (जो गुप्त रूप से शास्त्रार्थ की अस्वीकृति ही
थी) यह था कि हम वेद के ईश्वरीय वाक्य होने के विषय में प्रश्न करेंगे और जब तक हमारा अपना सन्तोष न होगा तब
तक किसी की न सुनेगे । इस पर स्वामी जी ने उनको भी वही उत्तर दिया जो पण्डितों को दिया था और इसके अतिरिक्त
यह भी कह दिया कि पहले आप वेद के विषय में प्रश्न करे, में उत्तर दंगा, फिर मैं कुरान पर आक्षेप करूंगा, आप उत्तर दे
और यदि आपको केवल वेद के ईश्वरीय वाक्य होने के विषय में ही प्रमाण चाहिये तो मेरी वेदभाष्य की भूमिका में जिसमें
समस्त बातें विस्तारपूर्वक लिखी है, देख लीजिए और फिर जो कुछ सन्देह रहे तो मुझसे प्रश्न कीजिये । सारांश यह कि
यह छेड़छाड़ भी यही तक रही, आगे न बढ़े।

एक चतुर नारी की कहानी-इसके पश्चात् एक पादरी साहब जिनका नाम गिलबर्ट और उपाधि मैक्मासर है
कछ ईसाइयों के साथ शास्त्रार्थ के लिए आये और आते ही स्वामी जी से यह बातचीत आरम्भ की कि वेद के ईश्वरीय
वाक्य होने में तुम्हारे पास क्या युक्ति है? चूंकि स्वामी जी उनके ढंग से समझ गये थे कि यह सब छेड़छाड़ है. कुछ सत्य
के निर्णय पर इस बातचीत का आधार नहीं इसलिए उनके प्रश्न के उत्तर में इस प्रकार कहा कि इञ्जील के ईश्वरीय वाक्य
होने का आपके पास क्या प्रमाण है ? यह सुनकर पादरी साहब कहने लगे कि वाह ! पहले तो हमारा प्रश्न है। उधर स्वामी
जी ने कहा कि वाह ! मुझको भी तो पहले उत्तर लेने का ध्यान है। इस पर पादरी साहब उठकर चलने लगे। तब स्वामी जी
ने कहा कि पादरी साहब ! आप तो शास्त्रार्थ करने को आये थे फिर इतना शीघ्र क्यों भागते हैं ? पादरी साहब ने इस पर
यह कहा कि जब आप उत्तर ही नहीं देते तो हम बैठ कर क्या करें? इस पर स्वामी जी ने कहा बहत अच्छा पहले में ही
उत्तर दूगा परन्तु उस के पश्चात् इजील के विषय में प्रश्न करूंगा और आप से उत्तर लेगा। इस पर भी पादरी साहब नजम
और उठकर भागने लगे। तब स्वामी जी ने कहा कि पादरी साहब ! आप पहले वेद पर केवल एक नही प्रत्युत दो-तीन प्रश्न
कर लीजिये परन्तु उत्तर देने के पश्चात् तो मेरे आक्षेपों को सुनिये ? परन्तु यह बात भी पादरी साहब को बुरी लगी और
उठकर चलने को उद्यत हो गये। तब स्वामी जी ने यह कहा कि अच्छा पहले आप पांच प्रश्न तक वेद पर कर लीजिये और
जब उनके उत्तर में दे चुके फिर मुझको अपनी इजील पर आक्षेप करने दीजिये परन्तु यह भी पादरी साहब को स्वीकार

Thomas

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