प्राचीन संस्कृत(sanskrit)part3

ना लिखना ही पर्याप्त है और बढिमानों के संकेत ही पर्याप्त होता है। अधिक विस्तार की आवश्यकता नहीं
| मंगलवार, आषाढ़ शुक्ल ६, संवत १९३७ तदनुसार १३ जुलाई, सन् १८८० ।"

ठपय्युक्त ।चिट्ठो अत्यन्त स्पष्ट संस्कृत में लिखी हुई है। यो तो बहत से शिक्षित आर्य लोगों से मेरा पत्रव्यवहार
है और कश्मीर त्रावणकोर आदि के विद्वानों से भी पत्रव्यवहार जारी है परन्तु यह चिट्ठी सबका एक नमूना है, इसका
अनुवाद सपने में मेरा अभिप्राय यह बतलाना है कि इस समय भी संस्कृत प्रचलित है और व्यवहार में लाई जाती है तथा
इसमें वे विचार प्रकट किये जाते हैं जो आर्यावर्त के शिक्षित व्यक्ति धार्मिक सुधार और अपने देश की शिक्षा की उनति
से ब्रिटिश सरकार के शासन काल में शान्तिस्थापना के लिए किया करते हैं । उक्त स्वामी जी ने भारत साम्राज्ञी के स्थान
पर गजराजेश्वरी शब्द का प्रयोग किया है ।

लेखक-मोनियर विलियम्स । आक्सफोर्ड, अक्तूबर, सन् १८८०।

इस चिट्ठी का अनुवाद उन्हीं दिनों 'इण्डियन मिरर कलकता और 'नसीम'आगरा में २० दिसम्बर, सन् १८८०
पृष्ठ २७४ पर तथा आर्य समाचार' मेरठ खंड २, संख्या २४, पृष्ठ ३७० पर प्रकाशित हो गया था।
स्वामी जी के देहरादून पधारने का संक्षिप्त वृत्तांत : नवीन मतवालों से शास्त्रार्थ की
छेड़छाड़ और तत्सम्बन्धी वास्तविकता

(७ अक्टूबर, सन् १८८० से २० नवम्बर, १० सन् १८८० तक)
“विदित हो कि स्वामी जी महाराज ७ अक्तूबर सन् १८८० को प्रात: आठ बजे के समय इस भूमि के सौभाग्य
से देहरादून पधारे और आते ही प्रत्येक की सूचना के लिए अपने आगमन के विज्ञापन स्थान-स्थान पर लगवाये जिससे
सर्वसाधारण को सुचना मिल गई। सत्य से प्यार करने वालों को प्रसन्नता हुई और अधर्मियों को द:ख और बेचैनी प्राप्त
हुई । संकल्प में साधारणतया यह प्रकट कर दिया गया कि स्वामी जी केवल वेदमत को मानते हैं और अन्य नवीन मतों
अर्थात पुरानी, कहानी, जैनी आदि की त्रुटियों और बुराइयों को उपयुक्त युक्तियों और शास्त्रोक्त प्रमाणों से सिद्ध करते हैं।
इसलिए उपर्युक्त में में से जो सज्जन अपने मत की सत्यता और वेदमत का खंडन कर सकते हों, वे आकर इस रूप में
शास्त्रार्थ करें कि अपने पक्ष के बीस सत्यप्रिय और न्यायकारी विद्वानों को अपने साथ लावे और उन को पंच ठहराये । इस
प्रकार स्वामी जी की ओर से भी बीस मनुष्य पंच नियत किये जावें और तीन आशुलिपिक दोनों पक्षों के प्रश्नोतर लिखने
के लिए (एक स्वामी जी की ओर से, दूसरा विरोधी पक्ष की ओर से और तीसरा पंचों की ओर से) नियत हों और प्रत्येक
प्रश्नोत्तर पर दोनों पक्षों और पंचों के हस्ताक्षर कराये जावे । शास्त्रार्थ की समाप्ति के पश्चात प्रश्नोत्तर की एक प्रतिलिपि
स्वामी जी के पास और दूसरी विरोधी पक्ष के पास रहेगी और तीसरी पंचो के मतानुसार न्यायालय में भेजी जावेगी ताकि
कोई व्यक्ति किसी प्रकार का परिवर्तन न कर सके और न किसी को व्यर्थ बोलने का अवसर प्राप्त हो ।"

उपर्युक्त नियमों को देखकर पौराणिक मत वाले सज्जनों ने आपस में मिलकर शास्त्रार्थ विषयक कछ चर्चा हो ।
लोगों को दिखाने के लिए की परन्तु साहसहीनता के कारण परामर्श करके मौन धारण करना ही उन्होंने उचित समझा। फिर
भी केवल एक दिन ऐसी चर्चा चली कि स्वामी जी से यहां के पण्डित लोग आज दिन के २ बजे मिशन स्कल में आया।
करने को तैयार है । इस प स्वामी जी ने उत्तर दिया कि प्रथम तो में संन्यासी हूँ, मुझे अभ्यागत समझकर मेरे पास आना
आपके लिए कुछ अनचित नहीं और यदि यह स्वीकार न हो तो थोड़ी दूर आप चलकर आये और थोड़ी दर मैं

Thomas

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