प्राचीन संस्कृत(sanskrit)part2

इंग्लैण्ड) के निवासी किस प्रकार के हैं और उनके स्वभाव और व्यवहार कैसे हैं? वहां को भूमि और जल
कैसी है और खाने के पदार्थ आदि वहां पर कैसे मिलते हैं? जब से तुम यहां से गये हो तुम्हारे स्वास्थ्य में क्या
है और तुम किस प्रयोजन से वहां गये हो वह तुम्हारी इच्छा वहां पर प्रतिदिन पूरी भी होती है बा नहीं ? तुम्हारे समोर
लोग संस्कृत पढ़ते हैं और सेवन से अन्य तुम से पड़ते हैं? तुम्हारा मासिक आयव्यय क्या है? तुम्हारे अपने अध्यवा
तथा दूसरों को पढ़ाने और विचार करने के चैनल-कौन से समय हैं? इस का क्या कारण है कि धर्मोपदेश करने विषय
तुम्हारी इंडिया जैसे यहां देश देशान्तर में फैल गई थी उसको वहां अभी तक नहीं फैली? कदाचित् या तो यह कारण हो कि
दूर हूं और तुम्हारी की्ति का मुझे
ज्ञान न हुआ और या यह कि तुमको
इस काम के लिए अवकाश न मिलता है । यदि दूसरा
| कारण है तो अब मेरी हार्दिक इच्छा है कि जिस समय तम पढ़ाने से निवृत्त होओ तो बेदमत को उनति में प्रयत्न करो और
इसके पश्चात् यहां तौट आओ परन्तु इस से पहले नहीं क्योंकि ऐसे उत्तम कार्य में कीर्वि प्राप्त करना रुपया प्राप्त करने से
श्रेष्ठ हो नहीं है, अपितु इस से एक प्रकार का कल्याण प्राप्त होता है। हमारे मित्र प्रोफेसर मोनियर विलियम्स
और
मोक्ष भूलर साव" की वेद तथा शास्त्रों के विषय में इस समय क्या सम्मति है और उनको और औरों को वेदभाष्य के
विषय में जो मैं इन तीनो कर रहा हूं-क्या सम्मति है? इन ग्रन्यों के अकों के प्रचार करने में उनको कहां तक रूचि है?
क्या यह सत्य है कि वो सोफिकल सोसाइटी ने एक शाखा वेदमत की न्दनपुरी (लन्दन) में स्थापित की है? कभी तुमने
राजराजेश्वरी का दर्शन भी प्राप्त किया है और कभी पार्लियामेंट (Parliament) में भी गये हो ? इन सब प्रश्नों का उत्तर
बहुत शीघ्र भेज दो। इसके अतिरिक्त और बातें जिन को तुम लिखने योग्य समझो, विस्तारपूर्वक लिख भेजो। इस समय

ट कीट्म्णुनकर्मस्वभाबा मानवा पूजतवायुपस्पभोज्यलेट्रवूष्याः पदार्शार्च सन्ति । अतो गत्वाऽद्य पर्यन्तं दर
पवदाल्यशुरेशरोग्यमस्ति न दा । एदर्दा याशा कता तटयोबन प्रतिदिन मिति न वा । भवत्समय्यदे तत्रत्या:कति जना: संस्कृतमधीयढे
के के न्य च । व भवतः किती मासिक प्रतिबंपरब । कस्मिन् कस्मिन् समये पदयते पादबते विन्यते च । ततोऽ कदाउममनाय
निश्चत कृटनन्ति किनिद पथाऽ सदमोपदेशबन्या पवत्कोद्दिस्तूओ्य देशदेशान्दरे प्सुता टन्र कुो न जाता जाता बेद्तो दूरदेशस्पास्ति,
तस्मादभिर्न कुता किम्? कि बेकारनेऽवकाते न तव्यः? स्व चेद यदा भवता पठनपाठने सचर्य वेदाथकषभित्रायन
दक्दुत्बनि उतत्देषु कृ्वैकशपनने धद् नान्यथेति निश्बयो मेउस्ति । कुत:? एनलाभात् सत्कोंर्दिलाओभो महान् शिवकरोऽस्त्वत:।
श्रोधृटरिपवराष्यपकमुनियर कितियंस (मोक्मूलणख्यानामपुना केदादिशासानां मध्ये कोइ (निश्चयः) प्रेम ढदर्थप्रचाखय)
विकोर्षस्यन्येषं च उ न्दनरर्या ककिद बैदिको शाताख्या दियोसोफिजत सभा प्रेरिता सभास्तीति श्त ततव्य न वा । भवटी
(स्टदिकमती) राजणजेस्वरी महाराजी पार्तीमेंटख्या सभा च दृष्टा न बा । भबता श्रीमत्रियवराध्यापकमुनियर
कितियसाक्ादिष्योऽलादरेन मनि्ियोगतो नमस्त इति संक्राव्य कुराले पृथ्वी के श्रुत्वा यदात् प्रत्युत्रं बबस्तददन्यच्च यददुक्त चेलिकउद
तदस्य सर्वस्थोंक्ठियत्युटरनि गषस्पानुक्टरनस्पापि तेखाईमुदर वै तत्सर्व विस्तरेण संलिख्याबिलन्बेन पत्र मत्सन्तलकी
नेचणीयनेवेत्तलनधिकतेखेन विररुणोल््टेषु।

मुनिरामांकभून्यन आारादस्य शुभे दले।
षष्ठ्यों हि मंगले बारे पत्रमेतदलेखिषम् ॥
इस पते से पत्र भेजना-बनारस लक्ष्मी कुंड,मुंशी बख्तावर सिंह जी मैनेजर वैदिक यन्त्रालय के द्वारा स्वामी दयानन्द सरस्वती

के पान पहुंचे।

द वेदिकयन्वं स्वाधीने नवीन स्थापित मस्माभिर्देर्वेदादिशालाणी मुद्राक्षरससिद्धयति वयम्

Thomas

Here you find some awesome old untold Stories about sports Featured on creditcardnumbersfree.com. So Stay tune with us.

No comments:

Post a Comment