प्राचीन संस्कृत(sanskrit)

जाती है, वहां भिन्न-भिन्न प्रकार को भाषाएं।पिन्-पिन प्रान्तों के विचारो के इका्रा करने में अत्यन्त कठिनाई उठ्पन्न कर
सकती है। कुछ लोगों का यह विचार है कि संस्कृत भाषा प्रयोग में नहीं ताई जाती और बहुत समानत
हास हो रहा है । परन्तु क्या कोई ऐसी भाषा को गृतक कह सकता है जो अभी वर्तमान हो और श्वास त !
परस्पर विचारों का आदान-प्रदान किया जाता है और बातचीत की जाती हो तथा दैनिक पत्रव्यवहार द्वारा जिस
स्थिरता प्राप्त हो और हिन्दूकुश से लेकर सोलोन (लंका पर्यन्त विद्याओं और धार्मिक विषयों के प्रकटीकरण द्वारा पूराी
दृढ़ता के साथ किस का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देता हो


'एथनिक' के पाठकों को स्मरण होगा कि एक वर्ष के लगभग आतीत हुआ कि जब एक हिन्दू क्षत्रिय नवयुवक
के पधारने के विषय में (जिसका नाम श्याम जी कृष्ण वर्मा< g जिसकी संस्कृत विद्या में उतम योग्यता है और जिसका
इस भाषा में लिखने और बोलने का सामथ्थ्य इतना उत्तम है कि उचित समझकर उस को पंडित को उपाधि प्रदान की गई हैं)
एक लेख प्रकाशित हुआ था और इस समाचारपत्र में यह भी लिखा वा कि उस नवयुवक व्यक्ति ने एक ऐसे जगत् प्रसिद्ध
व्यक्ति से शिक्षा पाई है जो केवल प्राचीन संस्कृत भाषा को ही जानता अपितु जिसने अद्वैत, नास्तिकता और मूर्तिपूजा
के खंडन द्वारा आर्यावर्त के समस्त धार्मिक सम्प्रदायों में बड़ी हलचल उत्पन कर दी है।

पं० श्याम जी कृष्ण वर्मा को पत्र
स्वामी जी आर्य जाति के एकमात्र, सच्चे धर्म एकेश्वरवाद के मानने वाले हैं और अपने धार्मिक सिद्धान्तों को वेद
पर आधारित सिद्ध करते हैं। देश की उन्नति और सुधार करने वाले इस व्यक्ति का नाम दयानन्द सरस्वती स्वामी है जिसके
भाषण की सुन्दरता और लेख की दृढ़ता का में स्वयं साक्षी हूं क्योंकि जब में बम्बई में था तो उस समय मैने उक्त स्वामी
जी को आर्यसमाज की सार्वजनिक सभा में धर्म-सम्बन्धी उपदेश देते सना है जिस का विषय 'आय का जावित धर्म' था
और इसके अतिरिक्त उनका एक संस्कृत पत्र जो उन्होंने अभी कुछ दिन पहले अपने शिष्य श्याम जी कृष्ण वर्मा को जो अब
वेलियल कालिज आक्सफोर्ड के सदस्य हैं, लिखा था, देखा है। इस पत्र को प्राप्त करने वाले की आज्ञा से मैं इस पत्र का
अर्थ लिखता है

पत्र का भावार्थ
"प्रियवर श्याम जी कृष्ण वर्मा को दयानन्द सरस्वती के अनेकशः आशीर्वाद । विदित हो कि यद्यपि तुम वेदमार्ग
पर दृढ रहने और अपनी विद्या के कारण प्रशंसा के योग्य हो परन्तु खेद है कि तुमने अपने लिखित पत्रों द्वारा मुझ को
चिरकाल से संबंधित नहीं किया। अब मैं आशा करता हूं कि अपनी कुशलता लिखकर तथा निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर
से मुझको प्रसन करोगे।

। यहां मूल उर्दू में भावार्थ लिखा है,परन्तु वस्तुतः यह भावार्थ ही है । मूल संस्कृत पत्र नीचे टिप्पणी में दिया गया है ।-सम्पा,
स्वस्ति
श्रीमच्हेष्टोपमार्हाय
विद्वद्र्याय
वैदिकघर्मार्गेकनिप्ठाय
निगमोक्तलक्षणप्रमाणेयम्र्यक्मोपदेशर-
प्रवर्तितस्वान्तायैतद्विरुद्धस्योच्छेदने प्रोत्साहितचित्ताय सहिदभ्योऽभ्यानन्दार्थ सूक्तसमूहवाक्यानुवाक्यप्रयुक्तवक्तृत्वाभ्यासशालिने
सर्वदा विद्यार्जनदानोत्कृष्टस्वभावाय लब्यायविपश्चिमानायास्मत्त्रियवराय श्रीयुत रामजी (कृष्ण) वर्मा दयानन्द सरस्वती स्वामिन
आशिषो भूयासुस्तमाम् । शमत्रास्मदीयमास्ति; तजत्ं नित्यमेघमानं चाशासे ।
बहमासाभ्यन्तरे भाबकपत्रानागमेन चित्तानन्दहासात् पुनरानन्दप्रजननायेदानीमेतस्मिन्निनलिखित्ताभिप्रायाणा पवन
(सकाशात् सद्:स प्रत्युतराभिकांशिणोत्साहयुक्त_मया पत्र श्रीमत्सनीह प्रेष्यते ।

Thomas

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