संस्कृत-विद्या(sanskrit vidia)part5

दूसरे दिन बातचीत के बीच में योगी जी ने कहा कि यह इन पोण जी की लीला है । पार्वती ने अपने
उतार फर बालक बना कर रख दिया, ।द्वार पर युद्ध हुआ, पार्वती को विदित न हुआ, चहे की सवारी और भी

दिया ।
भैने कहा कि इसमें शालार्थ की तो कुछ भी पाया प्रतीत नहीं होती; वरयोंकि पार्वती के तो हाथ थे और शरी।।
मैल उतार कर पतता बना ही सकते हैं । परन्तु आप तो यह कहते हैं कि तीन वस्तुएं अनादि हैं: जय रथल (रायण
हुई तो निरवयव परमात्मा ने सहयोग कर दिया। वह निरवयव (परमेश्वर) परमाणुओं का संयोग-विभाग कसे व
है?

"स्वामी जी ने कहा कि क्या तुम परमाणु को समझते हो ? झरोखे में जो दिखाई देते हैं उन को 'सरण करते
उनका ६० वा भाग परमाणु होता है । तुम उस परमाणु का अपने हाथों से संयोग-वियोग नहीं करा सकते । परमात्मा
परमाणुओं से भी सूक्ष्म है, उसकी दृष्टि में वे स्थूल हैं इसलिए वह संयोग-वियोग कर सकता है।

इस पर मैंने यह निवेदन किया कि जो परमेश्वर सूक्ष्म है, वह व्यापक कैसे है?

स्वामी जी ने कहा कि जो सूक्ष्म होता है वह व्यापक होता है; स्थूल कहीं व्यापक नहीं होता। जैसे आकाश सक्षय
है वह व्यापक है परन्तु पृथ्वी स्थूल है सो व्यापक नहीं।
मैंने कहा कि यदि परमेश्वर की व्यापकता आप आकाश की भांति मानते हैं तो इससे जीव और ईश्वर के स्वरूप
में अभिन्नता माननी पड़ेगी।

स्वामी जी-इस का पहले उत्तर हो चुका है । (उनमें परस्पर) अभिन्नता कदापि नहीं है; व्याप्यव्यापक भाद(सम्बन्ध)
रहता है।

पंडित भगवानसहाय मुख्तार न्यायालय ने वर्णन किया-'एक दिन स्वामी जी का श्राद्धखंडन पर व्याख्यान था ।
ब्राह्मणों ने कुछ ढेले भी फेंके थे परन्तु उसका प्रबन्ध ला० उल्फतराय कोर्ट इन्स्पैक्टर आदि सज्जनों ने कर दिया और भविष्य
में लोगों ने शरारत नहीं की।

एक दिन एक मुसलमान का लड़का आया और उसने कुछ प्रश्न किया और साथ ही कछ निर्थक बकने लगा।
इस पर स्वामी जी ने शान्ति से उत्तर दिया परन्तु वह पूर्ववत् बकवास करता रहा फिर भी स्वामी जी को तनिक क्रोध न
आया। यहां एक दिन व्याख्यान देते और एक दिन प्रश्नोत्तर करते थे। फिर यहां से मेरठ के उत्सव पर चले गये।

जिन दिनों स्वामी जी मेरठ में थे उन्होने अपने शिष्य पंडित श्याम जी कृष्ण वर्मा को एक पत्र संस्कृत में भेजा
थे। लंदन के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘एथिनिक' के ता० २३ अक्तूबर, सन् १८८०, संख्या २७६५ के अंक में पृष्ठ
५३२-५३३ पर इसको विद्वान मोनियर विलियम्स ने अपनी टिप्पणी को साथ प्रकाशित किया है।

पत्र पर विद्वान् मोनियर विलियम्स की टिप्पणी-बहुत कम व्यक्ति इस बात से परिचित होंगे कि संस्कृत भाषा
अभी तक आर्यावर्त के पत्रव्यवहार तथा दैनिक बोलचाल में कहां तक प्रत्यक्त होती है। इसकी एक विशेषता तथा सुविधा
यह है कि फ्रांसीसी भाषा के समान आर्यावर्त के समस्त प्रान्तों में जहां विभिन भाषाएं बोली जाती हैं शिक्षित लोगो के बीच
में इस का प्रयोग होता है । कृष्ण (अर्थात् श्याम जी कृष्ण वर्मा साहब ने अपने अनुसंधान से बताया है कि आयवत् में
दो-सौ के लगभग भाषाएं बोली जाती हैं । शिक्षित लोगों में प्रचलित संस्कृत तथा हिन्दुस्तानी भाषा जिन प्रान्तों में नहीं।

Thomas

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