संस्कृत-विद्या(sanskrit vidia)part4

उत्तर—यह ठीक नहीं है कि पाप के फल निर्णय हो बका। यदि निर्णय हो चुका तो भी कम के अनुसार
(मंलबुराई) दाना या निर्णय होगा पहले-पाछे येई भर्ती संबंधी बने। यह टीक है कि दण्ड न्यूनाधिक नहीं हो।
सकता इसलिए तो फिर बेटे के दान करने से उस के नरकगामी (पितर) को क्या लाभ हो सकता है? अव रहा मृतक
एवं द्रव किये धन के व्यय की बात तो यदि वड पांव में व्यय सना है तो और पाप में व्यय करता है, तो दोनों प्रकार से
व्यय करने वाले को हानि-लाभ है, किसी मुठक का उस से बोई सन्बन्ध नहीं । अन्यदा यदि पुज्यकारय में व्यय छन से
मृठक श लाम है तो पापा कार्य में व्यय करने से हानि भी अवश्य होगी. क्योंकि, उस धन से उसका लड़का पीछे जो काम
करता है, यह असम्भव है कि उस का प्रभाव न हो और च३ बापदे एकत्रित किये हुए घन से प्रायः सन्तान दुराचारिणी ही
होती है इसलिए यह सिद्धान्त हो अत्यन्त बुरा प्रभाव डालने वाला है ।(संवाददाता से)

फिर मुझे शीघ्र जाना था अधिक बातचीत न हुई । चलते समय भी स्वामी जी कहते थेकि इस बात का पुरा निर्णय
नहीं हुआ। उस दिन से स्वामी जी का प्रेम मेरे हृदय में घर कर गया।

"मेरे एक मित्र ला० बुधसिंह मुजफ्फरनगर निवासी ने कहा कि स्वामी जी से एकात में एक बात पूछना चाहता।
है। उसने पूछा कि शिक्षा के विषय में आपको क्या सम्मति है ? स्वामी जी ने कहा कि (स्त्री-शिक्षा से) जो लाभ है उन्हें
सब लोग जानते हैं। फिर मैंने कहा कि आप जो यह आक्षेप है कि सियां लिद्ध-पड़कर अधिक बिगड़ जावेगी और
व्यभिचार करने लगेगी क्योंकि लिखे-पढ़े होने के कारण ठन्हें गष्ठ-रूरप से पद्-ब्यवहार का अवसर प्राप्त होगा तो इस का
उत्तर वह है कि लिखने-पढ़ने से पाप न अधिक हो सकता है -न कम। यह अधिकतर संगति और बित पर निर्भर है। बहुत
से मनुष्य लिखे-पढ़े हैं और दुराचारी हैं परन्तु इतना अन्ठर है कि यदि शिक्षित मनुष्य पाप करेगा तो योग्यता के साथ करेगा
जिस का परिणाम बुरा न होगा।
यहा पर इस बार कम से कम व्या ब्यान हुए । ४ बजे से व्याख्यान होता था।

भगत जीवनलाल कायस्थ, मुजफ्फरनगर से प्रश्नोत्तर
प्रश्न-(प्रथम दिन) ज्ञान की निवृत्ति और ज्ञान की प्राप्ति के बिना दु:ख निवृत्ति और सुख ये प्राप्ति होतो
है या नहीं?

उत्तर–स्वामी जो सुख दो प्रकार के होते हैं-एक विद्याजन्य दूसरे अविद्याजन्य । विद्याजन्य ऐसा सख होता है
जिसको सर्व सुख कहते हैं और अविद्या जन्य ऐसा होता है कि जैसा पशु आदि को। अज्ञान की निवृत्ति बिना ज्ञान के नहीं
होती और न ज्ञान की निवृति बिना अज्ञान के जीव के अल्पज्ञ होने से एक विषय में उस को ज्ञान होता है और अनेक विषय
हमें अज्ञान और जो सर्वज्ञ है उस में अज्ञान नहीं रहता और जो अल्पज्ञ है उस में ज्ञान और अज्ञान दोनों रहते हैं और जो सर्वज्ञ
है वह उत्पाद नहीं और जो अल्पज्ञ है वह सर्वज्ञ नहीं। जो अल्पड़ है वह परिमित और एकदेशी होता है और जो सर्वज्ञ है
वह अनन्त देश बसद, काल दि सभी को सीमा से रहित है। जैसे आकाश सभी साकार द्रव्यों में व्यापक है और मर्तिमान
व्य व्याप्य है। व्यापक उसको कहते हैं जो सरवंदेशस्थित हो और व्याप्य उस को कहते हैं जो एकदेश हो । व्याप्य कस्तु
व्यापक से भिन्न होती है। तीनों अवस्था उस की व्यापक के साथ ही रहती है और जैसे मूर्तिमान् द्रव्य किसी अवस्था में
आकाश नहीं हो सकते और आकाश मूर्तिमान द्रव्य का स्वरूप भी नहीं हो सकता, इससे दोनों वस्तु भिन्न है अर्थात
व्यय-व्यापार दो वस्तुएं विशिष्ट रहती हैं, एक वस्तु विशिष्ट नहीं हो सकती।
रात के ग्यारह बज गये इसलिए वार्तालाप पूर्ण न हुआ।

Thomas

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