संस्कृत-विद्या(sanskrit vidia)part3

कृपा ओं के वार्षिकोत्सव के अवसर पर यहां पधार कर समाज पर जो कृपा की है और कुछ महाशयों के व्याख्यानों
विशेषतया स्वामी जी महाराज और पण्डित लक्ष्मीदत्त जी के उपदेश ने जो उत्सव की शोभा को दुगना कर दिया है, इस
कारण यह समाज उनका और भी अधिक आभार मानता है और उनके प्रति धन्यवाद प्रकट करता है। 'आर्यसमाचार
कार्तिक मास, संवत् १९३७, खंड २, संख्या १९, पृष्ठ २०६ से २०९ तक।

मुजफ्फरनगर का वृत्तान्त
१५ सितम्बर, सन् १८८० से २ अक्तूबर, सन् १८८० तदनुसार २आज संक्रांति और भादों सुदि १२, संवत्
१९३७, बुधवार से बदि १३, संवत १९३७ शनिवार तक ।
लाला निहालचंद जी वैश्य, रईस मुजफ्फरनगर ने वर्णन किया, स्वामी जी आसौज के महीने में यहां पधारे और
हमारे बंगले में नगर के पूर्व की ओर उतरे । मुंशी डालचन्द, हेडमास्टर जिला स्कूल, ला० बद्रीप्रसाद तहसीलदार, बाबू
बैजनाथ मुंसिफ और मैं, बताने में सम्मिलित थे। उन दिनो कनागत थे और इसी विषय पर मैंने स्वामी जी से कछ पूछा
था क्योंकि नगर के कछ पण्डित मेरे पास आये और कहा कि चलो हम चल के स्वामी जी से शास्त्रार्थ करें परन्तु मैने जब
उन से (पंडितों से) स्वयं बातचीत की तो वे मेरे ही प्रश्नों का उत्तर न दे सके परन्तु अन्त में उनके अनरोध पर मैं स्वामी जी
के पास गया। इतने में ला० बद्री प्रसाद जी भी आ गये और स्वामी जी से बातचीत आरम्भ की । लाला बद्रीप्रसाद जी ने
स्वामी जी से कहा कि आपसे शास्त्रार्थ करना चाहते हैं परन्तु कहा कि मैं न शास्त्रार्थ करना चाहता है और न शास्त्रार्थ
करने की योग्यता रखता हूँ परन्तु केवल शिष्य रूप में समझना चाहता हूं । उन्होंने कहा कि श्राद्ध का फल उस के(श्राद्धकर्ता
के पूर्वजों को नहीं पहुंच सकता क्योंकि प्रथम तो यह विदित नहीं कि पितर किस लोक में हैं?

इसके उत्तर में मैंने निवेदन किया कि यदि यह सिद्धान्त स्वीकार किया जावे तो दान का देना भी निष्फल है।
इसका फल हमको मरने के पश्चात् किस प्रकार मिलेगा?

उत्तर-वह जीव का अपना कर्म है और कर्म कर्ता के साथ रहता है; नष्ट नहीं होता । परन्तु मृतक का श्राद्ध दूसरे
का किया हुआ कर्म है । वह तब किया गया है कि जब उस का सम्बन्ध संसार से सर्वथा ट चुका था। इसलिए निष्फल
है और शास्त्र में भी ऐसा ही लिखा है । इसके अतिरिक्त यदि यह माना जावे कि हमारे दान या प्रार्थना से पितरों को अच्छा
लाभ पहुंचता है तो यह भी मानना पड़ेगा कि उसके (मृतक के शत्रु जो शाप देते हैं या उसके बेटे उस के नाम से छल करते
हैं, उस का भी प्रभाव उस पर अवश्य होगा। इस प्रकार तो यह सिद्ध होता है कि हमारी प्रार्थना द्वारा (मृतक को) स्वर्ग में
और (शत्रुओं के) शाप के द्वारा नरक में बार-बार आना-जाना पड़ेगा ।"

प्रश्न-इस पर मैंने यह कहा कि उसे शुभ कर्मों का फल मिलना चाहिये; अशुभ का नहीं, कारण कि जिस समय
वह व्यक्ति मरा उस समय उस के शुभ कर्मों के फल का निर्णय तो अवश्य किया जा चुका होगा । इसीलिए शाप का
प्रभाव अब नहीं हो सकता; ऐसे ही जैसे कि अधिकार प्राप्त न्यायाधीश जब किसी अपराध का दण्ड दे चुकता है तो प्रतिवादी
चाहे कितनी ही पुकार क्यों न करे, परन्तु दण्ड में न्यूनता या अधिकता नहीं हो सकती । पुण्य का फल किसी मृतक पितर
को इसलिए लिखा है कि जो धन मृतक ने इकट्ठा किया था वही धन उस की सन्तान शुभकर्म में व्यय करती है। उदाहरणार्थ,
उसने अपने धन संचय का कर्म करते हुए यदि कोई अधर्म भी किया हो और उस का दण्ड भी निर्णीत हो चुका हो तो चूंकि
उसके पश्चात उसकी सन्तान ने (वह घन) शभ कर्म में लगा दिया इसलिए उसका फल उस को मिलना चाहिये

Thomas

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