संस्कृत-विद्या(sanskrit vidia)part2

यों तो कर्नल साहब और मैडम से बहुत से विषयों पर बातचीत हई और उन्होंने भी योगविद्या आदि के विषय में
पंडित बलदेव प्रसाद साहू हेडमास्टर नार्मल स्कूल मेरठ के द्वारा स्वामी जी के बहुत से विचार सने और पूछे पर्तुसब
बातों में उदाहरणार्थ, समाज के एक या दो नियमों और ईश्वर विषय में उनका स्वामी जी से बहुत कुछ मतभेद रहा परन्तु
जैसे कि किसी ने कहा कि 'जिस का हिसाब साफ है उसको हिसाब लेने वाले से क्या भय'—सब प्रकार से उनका सन्तोष
करा दिया गया परन्तु ईश्वर विषय में उनका प्रम दूर न हुआ । यद्यपि मझको विश्वास है कि यदि वे स्वामी जी महाराज के
वर्णनों को इस बारे में सुनते तो निस्सन्देह सत्यासत्य को समझ जाते । परन्तु वे तो ऐसे हठ पर अड़े कि ईश्वर विषय पर
अपना अविश्वास प्रकट करते चले गये परन्तु बातचीत करने या सुनने को स्वामी जी के अनुरोध करने पर भी सहमत न
है। कर्नल साहब ने दो दिन समाज में जाकर थोड़े-थोड़ समय तक अपनी सीलोन यात्रा का वृत्तान्त सुनाया। इस देश
बालों को प्राचीनकाल का गौरव बनाकर कुछ उत्साह दिलाया और एक दिन बाबू छेदीलाल जी की कोठी पर भाषण दिया
जिसमें उन्होंने प्रथम आर्यसमाज के नियमों को जिनका अनुवाद अंग्रेजी में हमारे प्रधान जी ने कर दिया था, सभा में उपस्थित
लोगों को पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात् अपनी सोसाइटी के सिद्धांतों को पढ़ा और एक दूसरे का मुकाबला करके दिखाया।
फिर सालाना-यात्रा का हाल सुनाया और वहां के पादरियों से शास्त्रार्थ का वृत्तान्त वर्णन किया और स्वामी जी महाराज से
जो कुछ इस बार बातचीत हुई थी (जिस का वर्णन में संक्षेप में ऊपर कर चुका ह) उसको भी कह सुनाया। फिर धियासोफिकल
सोसाइटी और आर्य समाज के सम्बन्ध का वर्णन किया जिसको स्वामी जी महाराज ने भी इससे पहले भाषा के विज्ञापन
द्वारा प्रकाशित किया था । इसके पश्चात् वे अगले दिन शिमला चले गये परन्तु स्वामी जी महाराज के दो व्याख्यान और
हुए। फिर वे भी मुजफ्फरनगर के कुछ रईसों और निवासियों की प्रार्थना पर ता० १५ सितम्बर,'"सन्१८८० को वहां
चले गये ।'आर्य समाचार मेरठ, कार्तिक मास, संवत् १९३७, खंड २, संख्या १९, पृष्ठ २१८ से २२२ तक ) ।
आर्यसमाज मेरठ के द्वितीय वार्षिकोत्सव में व्याख्यान-फिर स्वामी जी मुजफ्फरनगर से आर्यसमाज के
वार्षिकोत्सव के अवसर पर मेरठ पधारे। प्रथम आश्विन बदी चतुर्दशी, संवत् १९३७ तदनुसार ३ अक्तूबर,सन् १८८०
रविवार का दिन था और आर्यसमाज की स्थापना की दृष्टि से यह दूसरा वार्षिकोत्सव था।

७ बजे प्रातः से समाज के चौक में वेद मंत्रों से नियमानुसार प्राचीन ऋषियों और मुनियों के हवन का प्रारम्भ हुआ
जो दस बजे समाप्त ुआ । इस के पश्चात् श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने प्रथम वेदमन्त्रों से परमेश्वर की
स्तुति, प्रार्थना और उपासना की, फिर हवन के महान् लाभों की व्याख्या की और पक्षपातियों और हठधर्मियों के साधारण
आक्षेपों का (जैसे कि श्रेष्ठ पदार्थों का व्यर्थ आग में जलाना, परमेश्वर को पुण्य पहुंचाना, अग्निपूजा करना, झठे विश्वास
में फंसे रहना आदि-आदि) जो कुछ लोग अपरिचित होने के कारण और कुछ हठधम से जान-बूझ कर किया करते हैं, भली
भांति खंडन किया। दोपहर के १२ बजे सभा विसर्जित हुई। मंगलवार को ४ बजे फिर उत्सव आरम्भ हुआ । प्रथम मेरठ
समाज के सदस्य बाबू मदनमोहन ने, फिर मास्टर बख्तावर सिंह साहब, बाबू गोविन्दसिंह साहब, मुंशी डालचन्द साहब, बाबू
भागवत प्रसाद साहब,पण्डित पालीराम साहब और पण्डित लक्ष्मीदत्त जी ने व्याख्यान दिये। सब के पश्चात् जगद्विख्यात
पण्डित स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने श्रीमुख से उपदेश करके श्रोताओं को लाभान्वित किया। स्वामी जी के व्याख्यान
की जहां तक प्रशंसा की जाये ठीक है और जितना उनकी कृपाओं का धन्यवाद किया जाये, उचित है । उन्होंने कछ तो
पंडित लक्ष्मी दत्त जी के कथन का समर्थन किया और ईश्वर-विषय में सत्यवादिता की प्रशंसा की तथा कुछ विभिन प्रकार
की शिक्षा दें और परोपकार और धैर्य के गुण वर्णन किये। यों तो यह समाज वैसे ही स्वामी जी की कृपाओं का जो इस
समाज पर प्रत्पत इस देशवालों पर साधारणतया है, किसी प्रकार धन्यवाद नहीं कर सकती और अब स्वामी जी महाराज
और पण्डित लक्ष्मीदत्त जो ने तथा सहारनपुर, रुड़की, आगरा, लाहौर, अम्बाला, कानपुर समाज के प्रतिनिधियों तथा

Thomas

Here you find some awesome old untold Stories about sports Featured on creditcardnumbersfree.com. So Stay tune with us.

No comments:

Post a Comment