संस्कृत-विद्या(sanskrit vidia)

मेरठ का वृत्तान्त
(८ जुलाई, सन् १८८0 से १५ सितम्बर, सन् १८८० तक)
८ जुलाई, सन् १८८० को स्वामी जी मेरठ समाज की प्रार्थना पर यहां पधारे और अवनी स्थित मी
जो उपमन्त्री आर्यसमाज मेरठ की कोठी में निवास किया। उनके आगमन का समाचार सुनते ही बिद्यप्रेमी म
हर्ष से भर गये और पोप और उनके शिष्यों का कलेजा ईष्या से टुकड़े-टुकड़े हो गया परन्तु उन्हें कुछ प्राप्त
अपनी ओर से वह पहले ही बहुत मनघहंत लिखते रहे परन्तु चूंकि असत्यभाषी की कभी प्रशंसा नहीं होती इस
लज्जित ही होना पड़ा । परन्तु क्या करं, स्वभाब से विवश वे। जब इस बार और कुछ न हुआ तो किराये पर एक
कहने वाले ही बुलाकर कथाएं कराई।
एक सज्जन ने तो समाज के समीप उपदेश के समय रामायण की चौपाइयां उच्च स्वर से कई दिन
ताकि न स्वय सुने न औरों को सुनने दें परन्तु इन बातों से होता ही क्या था । सुनने वालों का तो कुछ भी न गया।
दोषियों का दोष प्रकट हो गया।

सारांश यह कि इस बार स्वामी जी ने दो मास से अधिक यहां निवास किया और प्रतिदिन शाम के समय
निवासस्थान पर बैठकर लोगों को सत्योपदेश से लाभ पहुंचाते रहे। इन दिनों प्रति सप्ताह दो-दो व्याख्यान होते हैं कि
में विद्या का महत्व और उस की प्राप्ति की आवश्यकता, धर्म का सच्चा ज्ञान ईश्वर र माया का वर्णन पवित्र वेट ३
ईश्वर कृत होने के प्रमाण, प्रकटरूप में मुक्ति के साधन और उनको व्याख्या वेदान्तदर्शन, स्वार्थियों का स्वार्थ पप और
पुण्य के विचार का समर्थन नास्तिकों के आक्षेपों का खंडन तथा एक उपनिषद् के बहुत से स्थल और अन्यविभिनविश्ये
पर प्रकाश डाला। चूंकि स्वामी जी और रमाबाई *का बहुत समय से पत्रव्यवहार हो रहा था, इसलिए उसी पत्रव्यवहार के
समय रमाबाई एक बंगाली * और दो सेवकों सहित जिनमें एक ली और एक पुरुष वा, मेरठ समाज की प्रार्थना पर कला
से यहां पधारे और समाज के सदस्य बाबू छेदीलाल साहब की कोठी पर ठहरीं । ये अपने आपको दक्षिण की रहने वाली
बताती हैं और अब कुछ वर्षों से कतकता और उस के आसपास के प्रदेशों में रहती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस
देश की वर्तमान समय की स्त्रियों की तुलना में ये संस्कृत-विद्या में अति निष्णात हैं और व्याख्यान देने में तो जगदित
हैं। इन्होंने शिक्षा के विषय में चार या पांच व्याख्यान, एक बाबू ऐेदीलाल की कोठी पर और शेष समाज में दिवे । ये
व्याख्यान बड़ी धूमधाम के रहे। प्रथम तो भाषा साफ-और, फिर उस पर युक्तियां और उदाहरण प्रबल और प्रकरणानुकूल ।

सारांश यह कि बाई जो दो सप्ताह से अधिक यहां ठहरी और फिर अपने एक बंगाली मित्र के साथ जो उनके
आने के पश्चात् मेरठ आये थे, दिल्ली होती हुई अपनी जन्मभूमि की ओर चली गई। स्वामी जी महाराज ने अपनी रची हुई
पुस्तकों का एक पैकेट (जिसमें संस्कार विधि, सत्यार्थ प्रकाश, सन्ध्या, आयाभिकिनय आदि बहुत-सी पुस्तकें सम्मिलित थो)
रमाबाई को प्रदान किया और समाज ने उन के मार्गव्यय और उत्साहवृद्धि के विचार से एक सौ पच्चीस रुपया नकद और
दस रुपये मूल्य का एक थाल प्रस्थान के समय उनकी भेंट किया। बाई जी को विद्या सम्बन्धी योग्यता में कुछ सन्देह नहीं
और यह सब कुछ होने पर भी आश्चर्य है कि यदि वे सदाचारिणी न रहें और दराचार से अपनी योग्यता को बट्टा लगायें ।
उनके कुछ दिन यहां रहन-सहन देखने का हमारा यह अनुभव हुआ । इससे अधिक वृत्तान्त अधिक सम्पर्क होने पर ही जाना
जा सकता है।

इस बार कर्नल आल्काट साहब मैडम ब्लावट्स्की सहित शिमला जाते हुए स्वामी जी महाराज की भेट के तिर
यहां पधारे और बाबू छेदीलाल जी की कोठी पर उतरे ।

Thomas

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