पापों का छोड़ना(papo ka chodna)part5

बम्बई नगर के वार्षिकोत्सव का वृत्तान्त
(दिनांक २० मार्च, सन् १८८२, सोमवार तदनुसार चैत सुदि प्रतिपदा, संवत् १९३९)

आर्यसमाज दानापुर(बिहार) के सदस्य बाबू रामनारायण लाल, पंडित आदित्य नारायण, जनकधारी लाल इस उत्सव
के अवसर पर इस विचार से कि स्वामी जी भी वहीं है, बम्बई गये और स्वामी जी के पास ही ठहरे । स्वामी जी उस समय
समुद्र के तट पर गोशाला के समीप एक बंगले में उतरे हुए थे। उनका कथन है कि हम लोगों को दूर से देखते ही स्वामी
जी ने कहा कि देखो ! ये पटना वाले आते हैं।

हम लोगों ने स्वामी जी को मुख से पहचाना; क्योंकि जब स्वामी जी दानापुर आये, उस समय दर्बल और रोगी
हो रहे थे परन्तु इस समय नीरोग स्वस्थ और मोटे-ताजे थे। उन की बोली से हम लोगों ने पहचाना और नमस्ते किया।
स्वामी जी ने उत्तर के पश्चात् कहा कि उत्सव का हवन अभी होगा और सभा आरम्भ होगी, तुम लोग स्नान कर आओ।

हम लोग शीघ्र स्नान कर स्वामी जी के साथ वहां से चले और थोड़ी दूर जाकर जहां से मार्ग ठीक है, सवारी पर
बैठकर नियत स्थान पर पहुंचे । हवन कराने वाले दक्षिणी ब्राह्मण थे। उनमें से एक ब्राह्मण ऐसा था कि जिसको चारों वेद
स्वर-सहित कंठस्थ थे। वह बूढ़ा और काले रंग का था और उसके मख में दांत भी नहीं थे।

स्वामी जी ने हमसे कहा कि तुम लोग जो चतुर्मुख-ब्रह्मा (का नाम) सुना करते थे, वह यही है। चारों वेद इस
ब्राह्मण के मुख में है, यही ब्रह्मा है। परिणाम: उस दिन के यज्ञ में वही ब्रह्मा नियत किया गया। हवन के पश्चात् हम लोग
स्वामी जी के साथ चले आये।

सामवेद का सस्वर मधुर गायन-फिर सायंकाल स्वामी जी ने धर्मविषय पर व्याख्यान दिया और व्याख्यान
आरम्भ होने से पहले एक दक्षिणी ब्राह्मण ने तानपुरा हाथ में लेकर ऐसे स्वर से ‘सामवेद' का मन्त्र अलापा मानो राग को
साकार सा खड़ा कर दिया। लोग उस स्वर में मग्न हो गये। वहीं डाकखाने के बड़े अधिकारी एक अंग्रेज महोदय अपने
बाल-बच्चों सहित आये थे; वे चकित होकर सुनते रहे। व्याख्यान समाप्ति के पश्चात हम डेरे पर चले आये।

इस उत्सव का वृत्तांत देश हितैषी समाचार पत्र, अजमेर में इस प्रकार लिखा है-"२ मार्च,.५* सन् १८८१ को
आर्यसमाज बम्बई का वार्षिक उत्सव बड़ी धूमधाम से हुआ और स्वामी दयानन्द जी महाराज के ऐसे समय में उपस्थित रहने
से उत्सव में अत्यन्त आनन्द रहा।"(खण्ड १, संख्या १, १४ वैशाख,संवत् १९३९) ।

मोरवी निवासी पंडित शंकरलाल शास्त्री, नागर कहते हैं- दूसरी बार स्वामी जी के दर्शन हमने चैत्र मास, संवत्
१९३९ में बम्बई में आर्यसमाज के उत्सव पर किये । वहां स्वामी जी ने एक व्याख्यान संस्कृत में दिया था, उसमें बताया
था कि (व्यक्ति के सुधार की जो व्यवस्था आज प्रचलित है, उससे मनु आदि द्वारा विहित सुधार (की व्यवस्था) अच्छी थी।
उन्होंने बताया था कि चोर आदि को जो दण्ड मनु आदिने विहित किया है उसके कारण चोर चोरी करने से सदा डरता था
और आजकल के नियम के अनुसार तो चोरी करने में चोर को आनन्द आता है। उसको (अब तो) अपने घर की अपेक्षा
अच्छा भोजन और अच्छा घर मिलता है।"

२९ मार्च, सन् १८८२ को पंडित अमृतनारायण ने स्वामी जी से पूछा मन लगाकर उपासना की विधि
बतलाइये ? स्वामी जी ने कहा कि यम-नियम का पालन करो। कछ समय के पश्चात् उन्होंने फिर यही प्रश्न किया और
इसी प्रकार तीन बार यही उत्तर मिला। बार-बार प्रश्न करने का उन का प्रयोजन यह था कि आप जो यम-नियम कहते

Thomas

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