पापों का छोड़ना(papo ka chodna)part4

१-सभा का स्थान हमारी सम्मति के अनुसार होगा।
२-इस सभा में हम प्रधान की रीति पर सम्पूर्ण अधिकार वेगे जिससे दोनों पक्ष वालों के न्याय-अन्याय पर

३–शास्त्रार्थ लिखित होगा।
शासी जी को स्वामी जी के सम्मुख बैठकर उत्तर-प्रश्न करने होंगे।

५-=यद कोई पुरुष मूर्ति या किसी प्रकार से असभ्य भाषण करेगा, तत्काल सभा से निकाल दिया जायेगा ।
जब ये नियम पंडित लोगों ने सने तब उनका उत्साह और साहस सब हो गया क्योंकि उनका वास्तव में
जैसी आगरा आदि में कर चुके हैं। अन्त को स्वामी जी की वह प्रसिद्ध कहावत तेरी चप मेरी भी चुप' की लीला हुई
सत्यासत्य का निर्णय करने का अभिन्न नहीं था किन्तु दर-दर ही एक गप्पाष्टक द्वारा आपको वैसी ही लीला करनी थी
किसी ने सत्य कहा है सत्ये नास्ति भयं क्वचित्१ अर्थात् सत्य को कोई भय नहीं । यह वर्णन ७ ता० का है।

| "इसके पश्चात् श्री स्वामी जी निर्भय होकर पन्द्रह दिन तक आर्य लोगों को सत्योपदेश से आनन्द मंगल देते रहे
पन्त किसी ने शास्त्रार्थ का नाम तक न लिया । अन्त में राव साहब मसूदा का निमन्त्रण आने पर २३ जून, सन् १८८१ को
स्वामी जी मसूदा चले गये । १ जुलाई सन् १८८१ मुन्नालाल उपमन्त्री आर्यसमाज अजमेर।*(भारत सुदशा प्रवर्तक',
जुलाई, सन् १८८१,खड १,संख्या २५)

‘भारती विलास' आगरा में लिखा है-“स्वामी दयानन्द सरस्वती अजमेर में डेढ़ मास निवास करके और आर्यों
पर सदुपदेशों की वर्षा करके २३ जून, सन् १८८१ को मसूदा की ओर, जो अजमेर से १६ कोस की दूरी पर है, यात्रा पर
गये । (खंड १, संख्या १८, पृष्ठ १४५०,५ जुलाई, सन् १८८१)

उन्हीं दिनों आर्यावर्त के शिष्ट और प्रसिद्ध समाचारपत्रों में यह टिप्पणी प्रकाशित हुई-“प्रत्येक मनुष्य का
अपना-अपना एक आदर्श होता है; जैसे पंडितों का आदर्श केवल दक्षिणा है। स्वामी दयानन्द का आदर्श प्रतिमापूजन का
जड़-मूल से उच्छेदन है । इण्डियन पोप लोगों का आदर्श सेवकों से उनके तन-मन-धन का अर्पण कराना है।"

(हिन्दी प्रदीप' खंड ५, संख्या २, पृष्ठ १३; आश्विन शुक्ला ८, संवत् १९३८ तदनुसार अक्तूबर, सन् १८८१
व 'नसीम' आगरा-२३ दिसम्बर, सन् १८८१,पृष्ठ ३८५: 'उचित वक्ता' व 'आर्यदर्पण' सन् १८८१, पृष्ठ १९७)।

बम्बई नगर का वृत्तान्त (३१ दिसम्बर, सन् १८८१ से २ जून, सन् १८८२)
तदनुसार पोह सुदि ११, संवत् १९३८, शनिवार से आषाढ़ बदि प्रतिपदा, संवत् १९३९, शुक्रवार तक)।

शनिवार १२ ३० दिसम्बर, सन् १८८१ को स्वामी जी फिर बम्बई में पधारे। चूंकि उनके आने की सूचना पहले

ही आ चुकी थी इस कारण कर्नल एच० एस० आल्काट साहब, प्रधान थियोसोफिकल सोसाइटी, आर्यसमाज के कई
सम्मानित सदस्यों सहित, स्टेशन पर सवारी लेकर उपस्थित थे। गाड़ी के पहुंचते ही सब अत्यन्त उत्साह और प्रेम से बड़ी
नग्नता के साथ 'नमस्ते' कहकर मिले । स्वामी जी ने सब की कुशलक्षेम पूछ, घोड़ागाड़ी पर सवार हो, बालकेश्वर गोशाला
पर पहुंचकर सब की इच्छा अनुसार जो मकान नियत हुआ था, उसमें निवास किया। यह एक अति मनोहर और उत्तम स्थान,
समुद्र के तट
पर स्थित है। इस मकान के निचले भाग पर अरब का सागर टक्कर खाता है।

Thomas

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