पापों का छोड़ना(papo ka chodna)part3

होकर जाता था । अंतर वह
पूरी शान्ति पाने के पश्चात् ईसाई मत से विरक्त होकर वैदिक धर्मानुयायी हो गया ।"
चिह्न-स्वरूप अष्टाध्यायी की प्रति प्रदान की-"व्याख्यानों में सैकड़ों मनुष्य आते और लाभ उठाते थे । २४ मई,
सन् १८८१ को दोपहर के समय महाराज जी से विदा होने पर मैंने निवेदन किया कि आप मुझे अपना कोई चिह्न प्रदान
कर । एक पुस्तक अष्टाध्यायी की प्रदान की जो अभी तक पेशावर समाज में विद्यमान है। तत्पश्चात् उनके चरणों को हाथ
लगाकर नमस्ते करके दास वहां से विदा होकर चला आया।"

ता० ८ मई, सन् १८८१,रविवार से सेठ गजमल जी के स्थान पर महाराज जी के व्याख्यान आरम्भ हुए और ३०
मई, सन् १८८१ तक अर्थात् २२ व्याख्यान वेदादि विषयों पर निरन्तर निर्विध्तापूर्वक होते रहे। सैकड़ों पुरुष प्रतिदिन
उपदेश सुनने को आते थे और अपने-अपने धार्मिक गुणों से परिचित होकर लाभ उठाते और प्रसन्नता प्रकट करते थे। शेष
रही व्याख्यानों की व्यवस्था, सो वह तो कहने में नहीं आ सकती । हमारे व्याख्यानों के प्रबन्धकर्ता रायबहादुर पंडित भागराम
जज जज अजमेर थे। उनकी कृपा और सहायता से वह आनन्द आता था कि वर्णन नहीं हो सकता।
"प्रबन्ध के अतिरिक्त स्वयं राय साहब व्याख्यान के आरम्भ से अन्त तक बराबर सभा में उपस्थित रहते थे और
श्रोताओं की यह दशा थी कि ऐसे आनन्द में मग्न हो जाते थे कि उनको सात बजे से नौ बजे तक कुछ भी समय का व्यतीत
होना जान नहीं पड़ता था। यही इच्छा रहती थी कि कुछ और भी श्रवण करते रहें। यही व्यवस्था प्रत्येक व्याख्यान में रहती
थी और सभा की समाप्ति पर सब लोग धन्यवाद देते हुए अपने घरों को जाते थे परन्तु कोई-कोई अविद्याग्रस्त पोषमतानुयायी
पीछे से निन्दा भी करते थे। व्याख्यानों की समाप्ति के पश्चात् अर्थात् ५ जून, सन् १८८१ को एक हमारे आर्य भाई बाबू
हीरालाल नसीराबाद निवासी ने श्री महाराज जी से यज्ञोपवीत लिया और आठ बजे से हवन आरम्भ होकर १२ बजे समाप्त
हुआ। तत्पश्चात् इस आर्य भाइयों को भोजन भी सत्कारपूर्वक कराया गया ।'
इसके पश्चात् स्वामी जी के चार व्याख्यान प्रत्येक आदित्यवार को समाज मन्दिर में होते रहे । २२ ता० तक आर्य
सज्जन पुरुष अपनी-अपनी शंकानिवारणार्थ आते जाते रहे । परन्तु कोई पुरानी, कुरानी, पुराणी, जैनी इत्यादि शास्त्रार्थ करने
को नहीं आये। हां, हिन्दू भाइयों ने पंडित चतुर्भुज को स्वामी जी से शास्ार्थ करने को बुलाने का विचार किया और स्वयं
पंडित जी ने दो पत्र भी काशी से अजमेर में एक सेठ के गुमाश्ते के पास भेजे कि मुझको अजमेर बलाओ, स्वामी जी से
शास्त्रार्थ करके उनको परास्त करूंगा। जिस पर कई पौराणिक पंडित लोग भागराम जी के पास आये और बड़े अभिमान
से अपना अभिप्राय प्रकट किया कि उक्त शास्त्री अर्थात् पंडित चतुर्भुज शर्मा राजपौराणिक जी को स्वामी जी से शास्त्रार्थ
करने को बुलाते हैं, आप स्वामी को सूचित कर दीजिए। तब पंडित भागराम जी ने समाज के मन्त्री पंडित सुखदेवप्रसाद
जी को बुलाकर उक्त शास्त्री की चिट्ठी-पत्री दिखलाई और कहा कि यह स्वामी जी को दिखला कर अभिप्राय विदित
करो ।"

“सब को विदित है कि स्वामी जी सत्य के आधार पर सिंहवत् आर्यावर्त में सर्वत्र गर्जन कर रहे हैं फिर भला इन
की गीदड़ भभकी में कब आने वाले थे (और जब कि वे उक्त शास्त्री को भली भांति जानते थे)। तुरन्त ही स्वामी जी ने
कहा कि हम तो सत्यासत्य का निर्णय करने को ही फिरते हैं। पंडित भागराम जी से कह दो कि जो पंडित चतुर्भुज यहां
आवे तो हम भी उनके साथ शालार्थ करने को तैयार हैं। परन्तु प्रबन्ध और नियमों के साथ शास्त्रार्थ होना चाहिये । भागराम
जी से मंत्री द्वारा सब वृतान्त कहा गया तब उन्होंने पौराणिक पंडितों को बुलाकर कह दिया कि तुम निस्सन्देह अपने शास्री
जी को बुलाओ परन्तु निम्नलिखित नियम प्रबन्ध के लिए रहेंगे

Thomas

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