पापों का छोड़ना(papo ka chodna)part2

इन लोगों के पीछे इनकी बात का खंडन करने में एक महाशय कछ बोले थे परन्तु पीछे प्रयाग सम्पादक पंडित
देवकीनंदन ने संक्षेप से शास्त्री जी और प्रायश्चित कर्ताओं की निकली बद्धियों का वृतान्त कह दिया कि जो कुछ उस सभा
में उन लोगों ने किया, वह प्रपंच और आडम्बर ही था । शासी जी इस काम की आजीविका महाराज काशी के यहां से पाते
है, इसलिए उनको इस बुढ़ापे में ऐसा खेल करना पड़ता है। विद्याधर्म प्रचारिणी सभा, प्रयाग के उपर्युक्त उपदेशक दोनों
प्रायश्चित करना ही हैं । कहिये, जिनकी ऐसी सिद्धियां हैं वे क्या धल विद्या और धर्म का प्रचार करेंगे। ये भलेमानस सभा
के और लोगों को क्यों बदनाम करते है ? सभा को इस विषय में सावधान होना चाहिये ।

पाठक ! आप लोगों ने शास्त्री जी और उन के प्रपंची प्रायश्चितकर्ताओं की करतूत जान ली । क्या इन लोगो
से कुछ भी देश और धर्म की उन्नति होगी ? (प्रयाग से एक ्रष्टा) (भारतमित्र, कलकता ८ मार्च, सन् १८८३खंड ६,
संख्या १०)

आगरा से भरतपुर को प्रस्थान–१० मार्च, सन् १८८१ को श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी १0 बजे दिन के
समय रेल द्वारा भरतपुर की ओर चले गये। उस समय आर्यसमाज आगरा की ओर से एक मानपत्र सुनहरी कागज पर उन
को भेंट किया गया, जिस को स्वामी जी ने अत्यन्त प्रसन्नता से ले लिया और बहत से लोग उनको रेल तक पहुंचाने गये।
(नसीम, आगरा, १५ मार्च, सन् १८८१, पृष्ठ ७९, खंड ४, संख्या १० व‘भारती विलास खंड १, संख्या ८, पृष्ठ ६२)।

अजमेर (५ मई, सन् १८८१ से २२ जून, ११० सन् १८८१ तक)

स्वामी जी अभी आगरा में थे कि 'भारती विलास' आगरा में यह समाचार प्रकाशित हुआ—'श्री स्वामी दयानन्द
सरस्वती जी महाराज का इस ओर आगमन सुनकर सज्जन लोगों को अति प्रसन्नता हो रही है परन्तु ईसाई और मुसलमानों
के पेट में पानी उछलता है। इस कारण ये लोग उक्त महाराज जी से शास्त्रार्थ करने के लिये प्रबन्ध कर रहे हैं।'(संवाददाता,
अजमेर) (२५ फरवरी, सन् १८८१, खंड १, संख्या ६)

फिर लिखा है-“अजमेर नगर में भी सज्जन आर्यपुरुषों ने एक आर्यसमाज १३ फरवरी, सन् १८८१ को स्थापित
किया है। प्रत्येक आदित्यवार को गायन सहित ईश्वर-प्रार्थना की जाती है, तत्पश्चात् एक या दो सभासद् देशोन्नति या
आर्य धर्म के विषय पर व्याख्यान देते हैं। आशा है कि श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आने से यह समाज शीघ्र उनति
कराया।भारती विलास', १५ अप्रैल, सन् १८८१, पृष्ठ ८६)

सारांश यह है कि स्वामी जी महाराज आर्य पुरुषों के निमन्त्रणानुसार जयपुर से रेल द्वारा ५ मई,सन् १८८१ के
११ बजे रात को अजमेर स्टेशन पर पधारे । सज्जन आर्य पुरुष पहले ही स्टेशन पर उपस्थित थे। स्वामी जी को बग्घी में
बिठाकर सेठ फतहमल जी के बगीचे की कोठी में ठहराया। यह कोठी नगर के बाहर अत्यन्त खुले और चिताकर्षक स्थान
में स्थित है, शहर से बहुत दूर भी नहीं है।
प्रात:काल ही स्वामी जी के पधारने के समाचार दूर-दूर और घर-घर फैल गये । ७ मई,सन् १८८१को आर्यपुरुषों
की ओर से निम्नलिखित विज्ञापन प्रकाशित किया गया

विज्ञापन पत्र:-सब महोदय सज्जनों को विदित हो कि श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज संवत् १९३८,
मिति वैशाख सुदि ७, गुरुवार के दिन अजमेर में आकर आगरा दरवाजे के बाहर तार और डाकघर के पास श्री सेठ फतहमल
जी की वाटिका की कोठी में ठहरे हैं। उक्त स्वामी जी का सनातन वेदोक्त धर्म पर मिति वैशाख सदि १०,रविवार, संवत्

Thomas

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