पापों का छोड़ना(papo ka chodna)

ये तो केवल हू-हा और तौबा(पापों का छोड़ना) जानते हैं, सो करेंगे। बहुत से लोग तमाशा देखने ही के प्रयोजन
कितने ही ऐसे थे जिन्होंने पहले उनकी नकलें न सुनी थीं, उपदेश सुनने के प्रयोजन से भी गये । शास्त्र जी ने पहले
से ही अपने चारों ओर पुस्तक फला कर विस्तार सा कर लिया था कि जिससे कि वे बड़े भारी चारों वेद के वक्ता जाने
लोग आने लगे तब लगे हांकने परन्तु उपदेश क्या और सत्य धर्म किसका? जो जी में आया सो कहने लगे ।
पुस्तकों में से एक क हटाया एक को धरा, एक को आप पढ़ते हैं एक को दूसरे से पढ़वाते हैं, बीचव में पुस्तकों को पटकते
है। सारांश यह कि पुस्तकों की दुर्दशा करने और एक पुस्तक के दो-ढाई पृष्ठ सनाने के अतिरिक्त और कुछ न
। हां, इतना तो अवश्य हुआ कि स्वामी दयानन्द जी सरस्वती और आर्यसमाजियों को बरे शब्द पेट भर कर कहे
अपने व्याख्यान को सवांग सुन्दर करने और भाषा का लालित्य दिखलाने को बीच में ऐसे-ऐसे अवाच्य अपशब्द भी कहे
कि आर्यसमाजियों को चाहिये कि अपने घर की विधवाओं को ग्यारह-ग्यारह पति करावे, जो मैं आर्यसमाज में होता तो
अपनी विधवाओं, बेटियों को ग्यारह-ग्यारह पति अवश्य करवाता । ऐसा अश्लील बोलने में उन्होंने कछ कमी नहीं की।
इत्यत तीन घंटे से अधिक समय लिया। इसमें सब लोगों के प्रसन्न करने के लिए एक नियम भी रखा कि पुस्तक के ढाई
अपने सुनाये, उनको पन्द्रह-पन्द्रह बार लौट-लौट कर पढ़ा। कोई नया श्रोता आता तो फिर उन पत्रों को आरम्भ से सुनाना
प्रारम्भ करते । ज्यों-ज्यों नये श्रोता आते गये त्यों-त्यों उन्हीं पृष्ठों को बार-बार सुनाते रहे, पीसे हुए को पीसते रहे।
"कहिये सम्पादक जी ! आपने या आपके पाठकों ने भी कभी ऐसा भाषण सना है? हां, जो कभी ऐसे महात्माओं
का संयोग हुआ हो तो सम्भव है। ऐसे अनोखे व्याख्यानदाता कहीं और किसी को ही कभी-कभी मिलते हैं। मैंने कई बड़े
नगरों में बड़े-बड़े विद्वानों के व्याख्यान विभिन्न भाषाओं में सुने हैं। परन्तु यह ठठ्ठा, यह थियेटर,यह हाय-हाय, यह तौबा-तौबा,
यह असभ्यता, यह दुर्वाद, यह भद्दापन, यह प्रत्येक बात का बार-बार कहना, कहीं नहीं देखा। मैं नहीं चाहता कि ऐसे
सभ्यता विरुद्ध व्याख्यान के खंडन में ध्यान दें। ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों के खंडन में कौन बद्धिमान् प्रवृत हो सकता है। ऐसी
असभ्यता के कारण वे दो चार आर्य समाज जो वहां उसके व्याख्यान में उपस्थित थे, उसकी चेष्टा से घृणा करने लगे और
उनकी दृष्टि में वह गिर गया। मेरा प्रयोजन यहां इससे केवल शास्री जी की योग्यता को प्रकट करना हैं कि देखिये ऐसे
लोग भी शास्त्री कहलाते फिरते हैं।

पाठक ! कुछ और भी सोनिये । जैसे को तैसा मिला; ब्राह्मण को नाई । इस कहावत का तात्पर्य भी यहीं खुला

है। शास्ती जी कह चुके तब रामनारायण और बिहारीलाल नाम के दो ब्राह्मण उठकर बोले कि हमने स्वामी जी के वैदिक
मंत्रालय में थोड़े दिन काम किया था; इस से पापी हो गये थे ।अब शास्री जी केके उपदेश से प्रायश्चित करके शुद्ध हुए है!
धन्य रे बुद्धिहीन ! धन्य रे अविद्याभण्डारो ! क्या वैदिक मत को मानने वालों के कार्यालय में काम करने से तुम लोग पापी
हो गये । हम यहां कुछ नहीं कहते, केवल इतना ही कहते हैं कि पत्थर पड़े इन बुद्धियों पर ! हम प्रायश्चितकर्ता रामनारायण
इसे कहते हैं कि आर्य लोग तो साधारण हिन्दुओं को अपने से पृथक् नहीं समझते परन्तु तुम समझते हो। इसलिए इस पर
विचार करो कि अन्य देश तथा अन्य मत वाले हिन्दू मत के विरोधी पादरी लोगों के यहां जो पंडित पुस्तक और पूफ शोधते
और पढ़ा कर तथा रुपया कमा कर अपने घर वालों और सम्बन्धियों का पालन करते हैं, उनका तुमने क्या किया? वे बड़े
संस्कृत के विद्वान् है, क्या तुम उनसे भी प्रायश्चित कराओगे ? क्या तुम उनके प्रायश्चित न करने से अपना मेल-मिलाप
उनसे छोड़ दोगे? क्या समस्त आर्यावर्त को जो अंग्रेजी शासन के भीतर है, प्रायश्चित कराओगे? हम कहते है कुछ होना
हवाला नहीं, यह तुम्हारी छोटी बुद्धियों का नमूना है।'

Thomas

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