मुंशी लक्ष्मण प्रसाद(munsi laksman prsad)part5

आर्य समाज का सदस्य और न आर्य समाज का उपदेशक था । झूठ मनुष्य को लज्जित करता है । इसी लज्जा के कारण उसे
शीघ्र आगरा छोड़ना पड़ा।

एक दिन स्वामी जी चन्द्रग्रहण के समय चंद्र ग्रहण की वास्तविकता पर व्याख्यान दे रहे थे । जिला मथुरा के
ग्राम अछनेरा का रहने वाला रघुनाथ नामक सारस्वत ब्राह्मण वहां आ गया। यह व्याख्यान पीपलमण्डी में हो रहा था।
उसने जाते ही रौला डाला कि लोगो ! प्रहण पड़ रहा है, तुम लोग इस नास्तिक की बात सुन रहे हो, यह बड़ा पाप है। परन्त्
किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया । १५ जनवरी, सन् १८८१ के पश्चात् पंडित जी शीघ्र ही लज्जित होकर मथुरा के
सेठ जी के पास चले गये ।

पंडित चतुर्भुज और स्वामी दयानन्द

परिचय-यह पण्डित चतुर्भुज वर्ष में एक बार यहां माघ मेले के दिनों में आते हैं और दयानन्द के विरुद्ध अपने
मन की जो कुछ चाहते हैं, बक-झक जाते हैं । उसका कुछ प्रभाव हो या न हो, कोई समझदार उनकी बात पर कान दे या न
दे, पर ये व्यर्थ को टांय-टांय करने से नहीं चूकते । प्रतीत होता है कि अवश्य ही इसमें चतुर्भुज का कोई गुप्त प्रयोजन है।
*यह तो प्रसिद्ध बात है कि चतुर्भुज में दयानन्द की-सी विद्या नहीं है । तब ये अपने को किस प्रकार संसार में
उजागर कर रोटी कम खाएं? कुछ न सही, यही एक युक्ति सुझ गई। पुराने ढंग के छोटे-मोटे रजवाड़ों में प्रवेश पाने की
यह बहुत अच्छी चाल है । यह अपने को राज-पौराणिक कहकर प्रसिद्ध करते हैं। फिर पूछना चाहिये कि यह पंडितराज की
उपाधि आपको किसने दी है ! बृहस्पति भी यदि अपनी प्रशंसा स्वयं करे तो पतन या अपमान को प्राप्त होता है । दूसरे यह
कि जहां कहीं पहुंचे, दस-बीस धूर्त ब्राह्मणों को मिला, सौ-पचास मनुष्यों को कहीं इकट्ठा कर हू-हा करा चम्पत हुए। इन
दिनों के अनपढ़ मूर्ख ब्राह्मणों ने अब हिन्दू मत को स्थिर रखने की यही युक्ति सोच समझ ली है कि जिसमें न विद्या का
कोई काम, न विवेक और योग्यता चाहिए। बस इसी प्रकार असभ्यता के आधार पर गोलमाल करा प्रजा की आख में धूल
झोंकते जाये और हिन्दू धर्म की वास्तविकता को इसी प्रकार छिपाते हुए मनमाने ढंग से मूर्ख, हीन-दीन, प्रजा का शिकार कर
मारते-खाते रहें । सो अब उन्नीसवीं शताब्दी में यह बात चलने वाली नहीं है । पढ़े-लिखे लोगों को किसी प्रकार चतुर्भुज
जैसे लोगों की बेसिर पैर की बातों में श्रद्धा नहीं हो सकती । क्या बनारस या रीवां के दो-एक पुराने ढंग के राजाओं ने
चतुर्भुज को अपने दरबार में आने दिया, इतने ही से यह बस राजपौराणिक हो गये । झौगुर और मछली वाला उदाहरण !
हमको दयानन्द से कुछ प्रयोजन नहीं, न हम सर्वेश में उनके मत के पोषक हँ, न हमारा किसी प्रकार का सम्बन्ध उनसे हैं
परन्तु इतना कहेंगे कि दयानन्द एक अकेला साधु मनुष्य है जो सच्चे जी से देश की भलाई चाहता है। क्या भया जो
कहीं-कहीं पर किसी बात में बहका हुआ है, फिर पूरा करते बन नहीं पड़ता । फिर भी उसके व्यक्तित्व से देश को बहुत कुछ
लाभ पहुंचता है । चतुर्भुज तथा इस समय के विद्याहीन मूर्ख ब्राह्मण अपना प्रयोजन सिद्ध करने के अतिरिक्त देश और
जाति को कौन-सा लाभ पहुंचाते हैं जिससे सोच समझ कर अपनी पक्षपात-शून्य सम्मति का प्रकाश न करें । (हिन्दी प्रदीप)
फरवरी, सन् १८८३, खंड ५, संख्या ६, पृष्ठ २०, २१)
ऐसे लोगों से क्या होता है ?-नाम के पण्डितों की कार्यवाहियों का नमूना भी देख लीजिए । माघ के मेले में
यहां प्रयाग में शास्त्र चतुर्भुज शर्मा आये और अपनी कार्यवाही की चिन्ता में पड़े 1ता0 २५ फरवरी को विज्ञापन दिया कि
वे सत्य सनातन धर्म वेद तथा शास्त्र पुराणोक्त उपदेश करेंगे और नीचे यह भी लिख दिया था कि 'श्री दयानन्द सरस्वती
जी ने वैष्णव मत का खण्डन किया है और जो उसमें दोष लगाये हैं, उन का खंडन करंगे ।' इस विज्ञापन को देखकर कितने
सज्जनों ने तो यही कहा कि ये वही शास्त्री हं जो पहले भी बाजीगर (मदारी) की सी लीला करते थे. इनको खंडन-मंडन

Thomas

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