मुंशी लक्ष्मण प्रसाद(munsi laksman prsad)part4

गगीगिरघारीलाल साहब वकील ने वर्णन किया कि-¨वह इस अभिप्राय से आया था मैं स्वामी जी से शास्ार्थ

जन वह सामने तो कभी न आया। पं० चतुर्भुज ने विक्टोरिया कालिज में कथा बांचने के ढंग से व्याख्यान दिये ।
तर उसका बल इस बात पर था कि स्वामी जी ने ब्राह्मणों, पुराणों और मूर्तियों की बहुत हानि की । वल्लभ मत के
यों को बहकाता था कि यदि तुम इस प्रकार प्रमाद करते रहोगे तो तुम्हारी आजीविका जाती रहेगी। तुमको चाहिये
व पर नालिश करो । एक दिन में उसके व्याख्यान में गया वह इस के अतिरिक्त कुछ न कहता था कि जो ब्राह्मणों की
करता है, पुराणों और अवतारों को नहीं मानता, वह साधु नही हो सकता। जो इस प्रकार बस्ती और नगरों में रहे वह
संन्यासी नहीं हो सकता । ब्राह्मणों का बहकाता था कि तुम गुसांइयों से मिलकर उसपर नालिश करो, वह तुम्हारी बहुत हानि
=हा है और यह भी कहता था कि में इतना यल करके वनारस से आया है. मुझे भेट दो और सहायता करो। वह एक

धारण विद्वान् था । वह समस्त पौराणिक बातों को उदाहरण के रूप में उपस्थित किया करता था। स्वामी जी उसे एक
साधारण संस्कृत जानने वाला और सत्यनारायण की कथा बांचने वाला मानते थे और कहते थे कि वह अपनी आजीविका
के लिए यल कर रहा है ।"

पंडित जुगल जी सनाढ्य ने वर्णय किया *हम एक दिन पंडित चतुर्भुज की के व्याख्यान में गये । उस समय
गायत्री का विषय था। उन्होंने अष्टवर्षं ब्राह्मणम् नयेत्' यह गृह्यसूत्र पढ़ा परन्तु इस अन्तिम भाग जिसमें यह लिखा
है “अथ सर्वेषां गायत्री" नहीं पढ़ा। तब हमने कहा कि आप इस अन्त के टुकड़े को क्यों नहीं पढ़ते ? इस पर मोहनलाल
पंडित ने कहा कि महाराज ! यह बेलनगंज में सबको गायत्री मंत्र देते हैं। हम ने कहा कि शास्रानृकृल देते हैं; यदि विरुद्ध
हो
तो बतलावें । लोगों ने कहा कि तुम चतुर्भुज जी का सामना करते हो? हमने कहा कि आपको चतुर्भुज दीखते होंगे; हम
को तो दो भुजाओं में से भी केवल एक वही भुजा दीखती है जिसको वे उछाल रहे हैं । तब चतुर्भुज जी ने कहा कि मैं
दयानन्दी से बात नहीं करता। मैंने कहा कि मैं दयानन्दी नहीं हूं, सत्यावलम्बी हूं । चतुर्भुज बोले कि शास्त्रार्थ करना हो तो
घर पर आओ। इस पर हम और हमारे मित्र रामेश्वर उनके मकान पर गये। तब बहाना किया कि मेरा माथा धमकता है,
आप कृपा करके घर जायें और चलते समय उन्होंने आधा सेर पेड़े और एक-एक रुपया हमारी भेंटकिया । हम अपने घर
चले आये और फिर उनके व्याख्यान में नहीं गये ।"

चतुर्भुज जी ने दो स्वांग रचे । एक तो कुंजबिहारीलाल कायस्थ से, जिसने कभी स्वामी जी का व्याख्यान सुनकर
कंठी तोड़ डाली थी, प्रायश्चित कराकर उसी नगर में बाजे बजवा कर फिराया कि मैने प्रायश्चित कर लिया है

दूसरा यह कि रिवाड़ी निवासी हरदयाल ब्राह्मण, जो साधारण संस्कृत जानता और दीन दशा में फिरा करता, उन
दिनों बाबू भगवती प्रसाद सदस्य आर्य समाज आगरा के पास नागरी पढ़ाने पर छः सात रुपया मासिक पर नौकर था। चतुर्भुज
ने उसे जाल में फंसा कर और झांसा देकर इस बात पर उद्यत किया कि वह एक विज्ञापन इस विषय का जारी करे कि मैं
आगरा आर्यसमाज का पंडित हूं और आर्यसमाज के अमुक-अमुक सदस्यों को पढ़ाता हूं। अब तक मैं उनको और
आर्यसमाजों को बहुत अच्छा और सच्चा जानता तथा स्वामी जी के कथन को श्रेष्ठ मानता था परन्तु अब शास्ती जी के
मिलने से मुझ को ज्ञात हुआ कि मैं अब तक धोखे में था और अधर्म करता था इसलिए आज में प्रायश्चित करके आर्य
लोगों से अलग होता हूं और सब आर्य लोगों से प्रार्थना करता हूं कि तनिक होश मे आये, आर्य समाज के जाल से अपने
आप को बचायें आदि-आदि। सत्य है कि दोस्तों से भलाई करना ऐसा है कि जैसा सज्जनों से दुष्टता करना। खेद है कि
लालच, करने योग्य और न करने योग्य सब काम करा देता है । सारांश यह है कि उनके इस कार्य से पोप लोगों के छल
और पाखण्ड का भेद और भी अच्छी प्रकार लोगों पर खुल गया क्योंकि सब बुद्धिमान् जानते थे कि हरदयाल न तो

Thomas

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