मुंशी लक्ष्मण प्रसाद(munsi laksman prsad)part3

गुमाश्ता, सेठ लक्ष्मणदास (जो हमारे मुवक्किल ह) एक दिन हमारे पास आये और कहा कि आपने स्वामी जी को अपने
यहां ठहराया हुआ है और ये हमारे मत की निन्दा करते हैं, आप इनको मकान से निकाल दें क्योंकि आप हमारे वकील है।
मैंने कहा कि यदि किसी भलेमानस के मकान पर कोई छोटा मनुष्य भी आये तो उसे नहीं रोकता, फिर वे तो एक महान्
में
व्यक्ति हैं। मैं यह काम कदापि नहीं कर सकता । तत्पश्चात एक भेंट में नारायणदास ने कहा कि मथुरा शास्रार्थ हो ।
मैंने कहा कि यहां मध्यस्थ कौन होगा और कौन प्रबंध करेगा? उचित यह है कि जो शास्त्रार्थ करना चाहे वह एक लेख
लिखे और उत्तर स्वामी जी लिखें और फिर स्वामी जी के लिखे हुए का उत्तर वह लिखे। फिर पंडित लोग स्वयं निर्णय कर
लेग कि किस का कथन ठीक है और किस का अशुद्ध । इस पर वे सहमत न हुए, फिर वे कलकत्ता चले गये और वहां
जाकर एक धर्म सभा के पंडितों की मंडली इकट्टी क । पंडितों की सभा से तो कोई पत्र नहीं आया परन्तु उन दिनों कलकत्ता
के समाचार पत्र में कुछ लेख छपा था।*

“यही 'गोकरुणानिधि' लिखी और कुछ अंग्रेजी पढ़ा करते थे। कदाचित् विलायत जाने का विचार था कि वहां
जाकर सत्य उपदेश करे ।

उनके व्याख्यान का सारांश बाल्यावस्था के विवाह को रोकना, ब्रह्मचर्य का प्रचार, जीव रक्षा करना, देशी शिल्प
और कला की उन्नति और सत्य धर्म की ओर अधिक विचार करना था।

सियों में व्याख्यान देने के लिए प्रथम स्वीकार किया, फिर कहा कि उनके पति आकर हमारा व्याख्यान सुने, हम
स्त्रियों में व्याख्यान देना पसंद नहीं करते।

*एक मन्दिर के स्वामी जी ने हमको उसका ट्रस्टी बनाना चाहा, हम ने इन्कार किया। स्वामी जी से जब बात हई
तो उन्होंने कहा कि आपने बुरा किया। यदि आप (ट्रस्टी) होते तो सम्भवतः इस जायदाद से बहुत कुछ धर्मकार्य होता।
इतने में उन्होंने हमारे इन्कार करने पर भी हमारा नाम लिख ही दिया । स्वामी जी का कथन अब सत्य सिद्ध हुआ क्योंकि
हमने उस मन्दिर की जायदाद से एक स्कूल मथुरा में चालू कर दिया है।"
उन्हीं दिनों बाबू शिवदयाल असिस्टेंट इंजीनियर स्वामी जी से मिलने आये और उन्होंने यहां गोरक्षा पर व्याख्यान
दिया। स्वामी जी तख्त पर बैठकर व्याख्यान देते थे और व्याख्यान के पश्चात् तख्त से उतर कर नीचे बैठ जाते थे। यदि
कोई और व्याख्यान देना चाहता तो वह तख्त पर दे सकता था। किसी बात का उन्हें अभिमान न था।
पंडित चतुर्भुज का आना इसी बीच में पंडित चतुर्भुज शास्त्री जी भी आ गये और केवल अकेले ही नहीं आये।
प्रत्युत अपना सदा का ढकोसला भी साथ लाये अर्थात् आते ही गली-कूचों में, अनपढ़ों के सामने अपनी बड़ाई बघारने लगे
और स्वामी जी की अकारण निन्दा करना आरम्भ कर दिया । किसी को किसी ढंग से बहकाया किसी को किसी लालच
में
फसलाया सारांश यह कि जहां तक बन सका जो चंगुल में आया, उसको धर्मविरुद्ध मार्ग बतलाया ।"
अन्त में पंडित जी के व्याख्यान आरम्भ हुए।"३० दिसम्बर, सन् १८८० को पंडित चतुर्भुजसहाय पौराणिक ने
मौहल्ला बेलनगंज में, और ३ जनवरी, सन् १८८१ को पाठशाला विक्टोरिया कालिज में व्याख्यान दिया।" (नसीम!
आगरा,७ जनवरी, सन् १८८१)"और १५ जनवरी को उसके व्याख्यान समाप्त हो गये ।'(नसीम'आगरा, १५ जनवरी,
सन् १८८१)।
"पंडित जी व्याख्यान आरम्भ करने से पूर्व उच्च स्वर से कह दिया करते थे कि यदि आर्यसमाज का कोई सदस्य
यहां बैठा हो तो उसको चाहिये कि वह उठ जाये क्योंकि हम उसको न अपना व्याख्यान सुनाना चाहते हैं और न
मुख दिखाना और न उसका मुख देखना चाहते

Thomas

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