मुंशी लक्ष्मण प्रसाद(munsi laksman prsad)part2

सकते हैं। उसने कहा कि नहीं, आप को जूता और पगडी दोनों उतार कर जाना चाहिये । इसलिए स्वामी जी केतल
सागर के बरामदे से उनकी मूर्तियां देखकर चले आये ।

एक दिन पंडित जीतू जी और कालिदास जी माईथान निवासी आये और संध्या के विषय में प्रश्न किया कि आप
तो संध्या दो काली कहते हैं परन्तु संध्या तो त्रिकाल है। इसके उत्तर में स्वामी जी ने कहा कि प्रथम तो किसी विश्वसनीय
अन्य में नहीं पाया जाता कि तीन काल संध्या आवश्यक है, दूसरे, संध्या के अर्थ से भी प्रकट है कि दो समय होनी चाहिये ।
यदि आप लोग दोपहर की तीसरी संध्या कहें तो आधी रात की चौथी वयों न हो? और फिर पहर-पहर और घड़ी-घड़ी के
पीछे क्यों न हो ? इस प्रकार कोई समय खाली निरहुआ, सब समय संध्या ही किया की। इसलिए (सन्योराना) दा समय
को ही ठीक है, अधिक की ठीक नहीं । यही ऋर्रि-मेनियों का सिद्धान्त है। इस पर ये कुछ उतर न दे सके।

उन्हीं दिनों मंशी इन्द्रमणि यहां आये और मार्ग में वृन्दावन में सेठ नारायणदास के मकान पर ठहर और उनके
संवर्धक तथा उन जैसे विचार वाले बनकर यहां आये । यद्यपि स्वामी जी के सामने उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया परन्तु
की इन बातों से मुझे ऐसा जान पड़ा कि सेठ साहब ने उन्हें लालर देकर मिला लिया है। वे निरे 'मुंशी' ही ४, धर्म की टत्ें
पर्याप्त पहचान नहीं थी ।'

"एक दिन मुंशी इन्द्रमणि ने जीव के मुक्ति से लौटने के विषय में प्रश्न किया। स्वामी जी ने कहा कि यह असम्भव
है कि सदा के लिए मोक्ष हो जाये और यह भी असम्भव है कि जीव परमेश्वर में मिल जाये । पृथक् पृथक् गुणों के कारण
वे एक-दूसरे से सम्मिलित नहीं हो सकते । मुंशी इन्द्रमणि नवीन वेदान्त के ढंग' उतर देते थे।

राधास्वामी मत वालों से प्रश्न पत्र–“एक दिन राधास्वामी ** मत के ५-७ पंजाबी साधु आये जिनमें स्ियां।
और पुरुष दोनों सम्मिलित थे और प्रश्न किया कि कोई गुरु के उपदेश और सहायता के बिना संसार-सागर को पार नहीं
कर सकता । स्वामी जी ने उत्तर दिया कि गुरु की शिक्षा तो आवश्यक है परन्तु जब तक कोई चेला अपना आचार टोकन
करे कुछ नहीं हो सकता। उन्होंने प्रश्न किया कि ईश्वर के दर्शन कैसे हो सकते हैं? स्वमा जी ने कहा कि जैसे तुम मूर्खता
से ईश्वर के दर्शन करना चाहते हो इस प्रकार नहीं हो सकते । उनका एक प्रश्न यह था कि ईश्वर तो भक्त के वश में है ।
स्वामी जी ने कहा कि भक्ति तो ईश्वर की आवश्यक है परन्तु पहले यह समझो कि भक्ति चीज क्या है? किसी पुरुषार्थ
के किये बिना कोई वस्तु स्वयमेव प्राप्त नहीं हो सकती और जिस प्रकार तुम भक्ति करना चाहते हो उस ढंग से तो लोगों
को बिगाड़ने के लिए बहुत पंथ चल निकले हैं। इनसे लोक या परलोक का कोई लाभ नहीं हो सकता । मूर्तिपूजा पर भी
बात चली और उन्होंने कहा कि हम और हिन्दुओं से अच्छे हैं। स्वामी जी ने कहा, नहीं, वे (हिन्दू) रामचन्द्र और कृष्ण आदि
उत्तम पुरुषों के देवता और अवतार मानते हैं, तुम गुरु को परमेश्वर से बढ़कर मानते हो। इसलिए तुम उनसे किसी प्रकार
अच्छे नहीं; प्रत्यत बरे हो । उन्होंने कहा कि वेद के पढ़ने में बहुत समय नष्ट होता है परन्तु उससे कुछ भक्ति प्राप्त रहीं
होती । स्वामी जी ने कहा कि जो पुरुषार्थ कुछ नहीं करता और भिक्षा मांग कर पेट पालना चाहता है, उसे वेद का पड़ना
बहुत कठिन है। ये लोग कुछ भी विद्वान नहीं थे ।"
वकील महोदय की दृढ़ता-स्वामी जी ने किसी से झूठा समाचार सुना चूंकि वे प्रत्येक मत का खण्डन करते है
इसलिए मैजिस्ट्रेट ने उनको मेरे मकान से निकल जाने की आज्ञा दी है। स्वामी जी ने मुझसे कहा कि यदि आपको कुछ
भय हो तो हम किसी और स्थान पर प्रबंधन कर सकते हैं। मैंने कहा कि प्रथम तो मैं किसी का दास नहीं हरं इसरे आप कोई
बात कानून के विरुद्ध नहीं कहते और न सरकार के विरोधी हैं इसलिए मुझे कोई भय नहीं । वास्तव में यह झूठा समाचार
था जो सर्वथा निर्मल निकला । संभवतः यह बात सेठों या पादरियों की ओर से उड़ाई गई थी क्योकि सेठ गारायजदास'"*

Thomas

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