मुंशी लक्ष्मण प्रसाद(munsi laksman prsad)

सेठ सोनाराम जी ने जो पेलात जी के दामाद थे, बहुत कछ कहा कि आप हमारे पर कृपा करे परन्तु स्वामी जी ने अस्वीकाः
किया। अन्त में हम दोनों उनकी इच्छा के अनुसार उनसे सहमत हो गये, यहां उस समय कोई ‘आर्यसमाज' नहीं था और
न कोई सामाजिक विचार का था। स्वामी जी ने पीछे पूछा कि हम यहां महीना भर या न्यूनाधिक रहेंगे और व्याख्यान दिया
चाहते हैं, लोगों की इस विषय में क्या सम्मति है ?"
"उस समय मुंशी लक्ष्मण प्रसाद जी के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति सामाजिक विषयों से परिचित न था, इसलिए
हम सब लोगों ने परामर्श करके पीपल मंडी स्थित मुफीद आम' स्कूल के मकान में व्याख्यान का प्रवन्ध किया। यहां
लगभग एक माह तक सायंकाल के सात बजे से साढ़े आठ बजे तक प्रतिदिन लगातार व्याख्यान दिया और प्रत्येक व्याख्यान
के अन्त में नित्य आधे घंटे तक शंका समाधान होता रहा । वह मकान लगभग भर जाया करता था।

एक दिन मौलवी तुफैल अहमद, नगर कोतवाल ने पुनर्जन्म पर आक्षेप किया और कहा कि यह गलत प्रतीत होता
है; पुनर्जन्म मानने से तो अनेक आक्षेप खड़े हो जाते हैं। ईश्वर ऐसा अन्यायकारी नहीं है कि जीवों को बार-बार उत्पन्न करे
और फिर वे अनुचित अपराध करें । उदाहरणार्थ, एक व्यक्ति मर गया, इस समय जो उसकी बेटी है अगले जन्म में वह
उसकी पत्नी होवे ! स्वामी जी ने उत्तर दिया कि बेटी और बाप का सम्बन्ध शरीर का है, आत्मा का नहीं । चूंकि आत्मा का
किसी के साथ कोई सम्बन्ध नहीं इसलिए यह आक्षेप आत्मा पर लागू नहीं हो सकता । इस पर उनकी शान्ति हो गई और
वे फिर कोई उत्तर न दे सके।
"एक पादरी साहब हमारे मकान पर आये थे। उन्होंने प्रश्न किया कि आपने जो वेदभाष्य में ‘अग्नि' को परमेश्वर
कहा है, वहां ‘अग्नि' का अर्थ परमेश्वर नहीं हो सकता ।"**°स्वामी जी ने कहा कि प्रथम तो व्याकरण के अनुसार इस शब्द
का अर्थ परमेश्वर हो सकता है। दूसरे-गुणों की दृष्टि से भी परमेश्वर का नाम हो सकता है । इस पर उनकी कोई शंका न
रही । फिर उन्होंने स्वामी जी से पूछा कि आप कभी पर्वत पर आते हैं या नहीं? यदि कभी आवे तो मैं बहुत-सी बातें पूछना
चाहता हूं । स्वामी जी ने कहा कि मैं विश्राम करने के लिए तो नहीं, हां धार्मिक काम करने के लिए जा सकता हूं। स्मरण
पड़ता है कि वे मसूरी या नैनीताल के पर्वत पर रहने वाले पादरी थे ।"

"सेट पीटरसन चर्च के बड़े पादरी साहब ने स्वामी जी के पास मनुष्य भेजा कि मैं आपसे मिलना चाहता हूं।
स्वामी जी ने मुझसे कहा कि यदि हम उनसे मिले तो कुछ हानि नहीं और अच्छा होगा, प्रत्युत उन के चर्च को भी देखेंगे।
मैंने कहा कि कोई हर्ज नहीं । फिर हम गये । पादरी साहब ने कहा कि जिस प्रकार राजराजेश्वरी विक्टोरिया, किसी दूसरे
की सहायता लिये बिना भारत पर शासन नहीं कर सकती, उसी प्रकार ईश्वर मसीह की सहायता के बिना संसारी मनुष्यों
का अथवा मुक्ति का प्रबंध नहीं कर सकता । स्वामी जी ने कहा कि प्रथम तो जो उदाहरण है, वह ठीक नहीं क्योंकि जीव
तथा परमेश्वर में समता है ही नहीं। दूसरे, पहले ईश्वर का लक्षण करो कि ईश्वर क्या वस्तु है? फिर स्वामी जी ने उसके
सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, अविनाशिता, सर्वशक्तिमता आदि गुण बताये और कहा कि ऐसे गुणों वाला ईश्वर इस बात की
आवश्यकता नहीं रखता कि किसी दूसरे की सहायता से प्रबंध करे। तीसरे, यदि हम मान भी लें कि ईसा कोई अच्छे पुरुष
थे तो भी वे एक मनुष्य थे और ईश्वर न्यायाधीश है, फिर वह किसी मनुष्य की सिफारिश से अन्याय नहीं कर सकता। जैसा
जिसका काम होगा वैसा फल होगा इसलिए यह असम्भव है कि परमेश्वर किसी की न्याय-विरोधी सिफारिश को स्वीकार
करके पुण्य-पाप के अनुसार फल न देवे। इसका वे कोई उत्तर न दे सके ।"
फिर पादरी साहब से पूछकर गिर्जा को देखने गए। वहां एक व्यक्ति ने कहा कि आप पगड़ी उतार लीजिये।
स्वामी जी ने कहा कि हमारे नियम के अनुसार कपड़े का पहनना सम्मान में सम्मिलित है, यदि तुम चाहो तो हम जूता

Thomas

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