फल असीम(FL Ashim)part5

दयानन्द सरस्वती जी-पादरी साहब ने मेरे प्रश्नों के ठीक-ठीक उत्तर नहीं दिये।जय
तो एक देह में आना या एक देह से निकलना असम्भव है। ईश्वर ने देह धारण किया, इराकी आवश्यक
इसका कुछ उत्तर नहीं दिया और इसका भी कुछ उत्तर नहीं दिया कि ईश्वर और जीव आध्यात्मिक (आप) के
समान है या उस विषय में कुछ भिन्नता है? पहले पादरी साहब कह चुके हैं कि लिखा है कि मनुष्य की आत्मा अपने
में बनाई। इसके विपरीत पीछे कहा कि वे पृथक् पृथक् हैं, एक नहीं । मुझ से पूछा कि पंडित जी इसका अभिशय बतलावे
मैं पादरी साहब का तात्पर्य क्यों बतलाऊं ? वही बतलावें । मैं भी जानता हूँ कि परमेश्वर सर्वव्यापक है इस कारण व
अवतार धारण नहीं कर सकता; क्योंकि (प्रश्न होगा कि क्या पहले वह उसमें नहीं था ? या उसमें एक था? अब टमा
तीसरा इसी प्रकार ? हजारों घुस गये ?जब वह असीम है तब सीमा वाले शरीर में देह धारण किया, यह बात बिल्लप्रद
है। जो पादरी साहब ने यह कहा कि मनुष्य की आत्मा अपने स्वरूप में बनाई, बन्दर की नहीं, इस पर मैं पूछता है कि व
किसके रूप में बनाये ? क्या बन्दर का खुदा कोई दूसरा है? इस प्रकार तो सब के अर्थात् हाथी, घोड़े आदि के खदा दसरे
अलग-अलग होंगे।

जव सर्वव्यापक है तो उसमें देह धारण नहीं किया प्रत्युत (उसने) सारा जगत् अर्थात् एक-एक कण धारण का
रखा है। पादरी साहब का यह कहना कि(ईश्वर) देह धारण करता है, सर्वथा मिथ्या है। क्या वह पहले धारण नहीं करता
मैं
था? क्या सर्वशक्तिमान ईश्वर अपनी इच्छा से देह धारण करता है? यदि करता है तो में पूछता हूँ कि वह अपनी इच्छा
से देह छोड़ भी देता होगा क्योंकि जो कोई पकड़ेगा वह छोड़ेगा भी। वह कभी अपने मारने की भी शक्ति रखता है या
नहीं? जो कहिये कि नहीं तो इस बात में तो वह सर्वशक्तिमान् नहीं है । जैसे अविद्या आदि और अन्याय आदि का उसका
स्वभाव ही नहीं है, वैसे ही जन्म-मरण आदि के न होने में भी उसका स्वभाव प्रतिबन्धक है क्योंकि यह अपने स्वभाव के
विपरीत कोई कार्य चरितार्थ नहीं कर सकता।

हस्ताक्षर दयानन्द सरस्वती
पादरी टी० जे० स्काट साहब-मेरा यही प्रश्न है कि क्या पंडित जी का यह अभिप्राय है कि अब परमेश्वर देहधारी
है? क्योंकि उसकी युक्ति से प्रतीत होता है कि वे यह दावा करते हैं कि परमेश्वर अब देह में है और अब ये सभी सूरते
(आकृति) जो दिखाई देती हैं, उसका देह ही हैं, तो बस इसी से मेरा दावा सिद्ध हो गया। अब इसमें और (सिद्ध करना
क्या रहा ? देहधारण का अर्थ क्या है? क्या इसका यह अर्थ है कि पश, वृक्षा और पापाण आदि के देह में होना हो उसका
देहधारण है? यद्यपि अनादि काल से परमेश्वर सर्वव्यापक तो है, परन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं कि वह इस प्रकार से
देहधारी है, जैसे जब कोई कह दे कि अमुक व्यक्ति परमेश्वर का अवतार है तो पंडित जी इसमें क्यों झगड़ते हैं? देहधारण
का अर्थ कौन नहीं जानता ? और यह कह देना इस विशेष अभिप्राय से कि ईश्वर देहधारी हुआ इसमे कुछ आने-जाने को
चर्चा नहीं है परन्तु केवल यही अर्थ है कि वह हमारे लिए शरीर में प्रकट हुआ। जब वह शरीर अदृश्य हो जाये तब भी
ईश्वर वहां पर विद्यमान है; परन्तु वह ईश्वर की आत्मा उस शरीर में उस समय भी हैवानी (जैवी) आत्मा नहीं है । अभी
आत्मा इस शरीर में प्रकट हुई। यह कुछ आने-जाने की बात नहीं है। मैंने साफ-साफ कहा है कि मनुष्य की आत्मा ईश्वर
की आत्मा के समान है परन्तु पृथक् है । बन्दर की स्थिति और है। उसकी चर्चा करना क्या आवश्यक है? हा प्रश्न यह
कि ईश्वर ने बन्दर को किस सूरत में बनाया, (उत्तर यह है क) जैसी उसकी इच्छा हुई बनाया अर्थात् बन्दर की आकृति
गीदड़ की आकृति और बैल की आकृति (बनाई) और मनुष्य को अपनी आकृति का बनाया । अब इसमें शंका करने की
क्या आवश्यकता है ?

Thomas

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