फल असीम(FL Ashim)part4

नहीं यह प्रश्न था) । या प्रणाम तो प्रश्न यह है कि उसको देहधारण करने की आवश्यकता ही क्या है?
दूसरे-उसकी इच्छा पर कोई प्रतिबन्ध है यानही 2तेरे वह निराकार है यासाकार ? चौथे वह सर्वव्यापक है या एकदेशीय ?
जीव और ईश्वर के दया आदि गण परस्पर ठीक ठीक एक से है या नहीं ? बहुत से जीवों में भी दया देखने में आती है।

वे दोनों एक है, तो फिर दोनों ईश्वर सिद्ध होते हैं? इसका व्या उत्तर है? आत्मिक रीति में यदि परमेश्वर देहधारी !
होता है तब (प्रश्न यह उठता है कि वह सारा का सारा ही देर में आ जाता है या दकहे़े-टकड़े हकर आता है? यदि ।
दुकड-खड़े होकर आता है तो नाशवान हुआ और जो सारा का सारा देह में आ जाता है तो शरीर से छोटा हुआ । यदि
ऐसा है तो वह ईश्वर ही नहीं हो सकता और जीव तथा ईश्वर में कछ भी भेद नहीं आ सकता है । और यदि वह एकदेशी
है तो एक स्थान पर रहता है या घूमता फिरता है? जो कहिये कि एक स्थान पर रहता है तो उस को सब स्थानों की सूचना
रखना असम्भव हैं और जो घूमता-फिरता है तो कही अटक भी जाता होगा और कहीं धक्का और शव भी लगता होगा ।
जब परमेश्वर सृष्टि करता है तब निराकार स्वरूप से या साकार से ? जो कहो कि निराकार स्वरूप से तब तो ठीव है और
जो कहा कि देहधारी होकर (सष्टि करता है, तब तो सर्वथा स्टि करना असम्भव है क्योकि सृष्टि के कारणभूत त्रसरेणु आदि
आदि पदार्थ उसके (देहधारी के) वश में कभी नहीं आ सकते।

हस्ताक्षर–स्वामी दयानन्द सरस्वती

पादरी स्काट साहब-हम नहीं कहते कि ईश्वर को सर्वथा नहीं जान सकते परन्तु तो भी बहुत बाते हम बिलकुल
नहीं जान सकते । सर्वव्यापक के विषय में विश्वास है कि वह ऐसा है परन्तु कोई नहीं कह सकता कि इसका अभिप्राय हम
को अच्छी प्रकार से विदित है। यह तो हम कह सकते हैं कि ईश्वर ने देह धारण किया परन्तु उसका अपने में देह धारण
करना एक रहस्य है; यही नहीं अपितु हमारी आत्मा को शरीर से सम्बन्ध एक रहस्य है । रहा यह प्रश्न कि ईश्वर की इच्छा
पर कोई प्रतिबन्ध है या नहीं ? पंडित जी इसका तात्पर्य बतलावें । मैं कहता हूं कि परमात्मा की आत्मा और मनुष्य की
आत्मा किसी प्रकार एक-समान नहीं है। एक सीमित है तो दूसरी असीम । इसलिए दो ईश्वर नहीं हैं। इनमें एक सृष्टिकतर्ता
है और दूसरा सृष्टि (बना हुआ है । परन्तु (यह तो) ईश्वर की इच्छा थी कि (उसने) मनुष्य को अपने जैसे बनाया। हम यहां
मनुष्य की आत्मा के बारे में बात करते हैं, दूसरे जीवों के बारे में नहीं यह नहीं लिखा है कि ईश्वर ने बन्दरों को अपनी
सूरत में बनाया । रहा यह प्रश्न कि क्या पूरा का पूरा ईश्वर शरीर में आ जाता है। हां, पूरा का पूरा शरीर में, परन्तु तो भी
बाहर भी रहता है क्योकि सर्वव्यापक है । तो उस शरीर के भीतर कयों नहीं है? परन्त हम यह नहीं कहते कि और कहीं
नहीं है। ध्यान दीजिए कि इस कमरे के भीतर है, वह सर्वशक्तिमान् इस समय उपस्थित है अर्थात् ईश्वर अपनी समस्त
विशेषताओं के साथ इस कमरे के भीतर विद्यमान है। क्या कोई अस्वीकार कर सकता है ? तो इस में क्या कठिनाई है यदि
उसकी इच्छा ऐसी हुई कि अपने आपको एक शरीर में प्रकट करे। यह असम्भव नहीं है। उसकी इच्छा है, जब कोई उद्देश्य
हुआ (शरीर में आ गया और यह अपनी विवशता से नहीं करता, प्रत्युत हम लोगों के लिए (करता है)। क्योंकि यदिहमारी
बुद्धि बहकाना जानती है तो आगे चलकर हम देख लेंगे कि (इसका कोई उचित कारण है या नहीं कि ईश्वर देह धारण
करे । यदि कोई कह देवे कि देह धारण करना उसकी पूज्यता के विरुद्ध है तो यह उसकी भ्रान्ति है। वह किस बात में उसको
पूज्यता के विरुद्ध है? देह में कोई दोष है या कोई अपवित्रता है या कुछ गन्दापन है कि ईश्वर उससे घृणा करे ? देह को
किसने बनाया है ? क्या वह अब भी सर्वव्यापक नहीं है? (है) अर्थात् प्रत्येक देह में अब भी विद्यमान है।

Thomas

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