फल असीम(FL Ashim)part2

ठीक हीं है, क्योकि कभी-कभी नीद में बात भले ही याद नहीं रहती, परन्त तो भी बात प्राय:
-याद तो रहती हो है । इसी प्रकार पिछले जन्म की कोई (एक भी) बात व्यों नहीं याद रहती ? कारागार का जो उदाहरण है.।
वह भी पूरा नहीं घटता क्योंकि इससे दण्ड का केवल एक ही प्रयोजन गष्ट १, द६ कदाप्रपा
दण्डित कविता को सुधारने के लिए होता है, दूसरा देखने यालों की सीख के लिए परन्तु इरा पुनर्जन् में केवल देखने वालों
को सीख मिलती है। ऐसा नहीं है कि दिदत व्यक्ति को इस बात का ज्ञान हो कि यह दण्ड मुन की जान

रहा यह प्रश्न कि आत्मा कहां से आई है, वह शिक्षित जातियों का आजकल यह दब कथन है कि बीज से श्रीज
र वृक्ष से वृक्ष उत्पन्न होता है कोई यह नहीं कहता कि अमक वह पहले हुआ ।इसी प्रकार आत्मा से आत्मा और शरीर
से शरीर उत्पन्न होता है । तथापि यह बात बुद्धि से परे की है कि कोई शरीर-विशेष किस प्रकार उत्पन्न होता है और आत्मा
किस प्रकार उत्पन्न होती है। परन्तु यह आत्मा जो अब विद्यमान है, वह पहले किसी शरीर में थी, यह समस्या नहीं है। यह
तो अभी उत्पन्न हुई है और जब यहां से जायेगी तो इसका न्याय कर्मानुसार ठीक-ठीक होगा। इससे परमेश्वर अन्यायी
है:
नहीं ठहरता है,प्रत्युत इससे भी परमेश्वर का न्याय ही सिद्ध होता है । रहा यह प्रश्न कि आत्मा सदा कहां रहती है सा दम
यह दावा नहीं करते कि हम परोक्ष के जानने वाले हैं और सख का स्थान बतलावें कि वह कहां है? सर्वशक्तिमान ईश्वर
आत्मा को सुख का स्थान दे सकता है। हमारे जानने या न जानने से क्या होता है !

हस्ताथ्रार-स्कॉट

स्वामी दयानन्द सरस्वती-जो कर्नल आकाट साहब के विषय में पादरी साहब ने कहा कि वह अबछा पुरुष नहे,
यह बात में ठीक नहीं मान सकता क्योंकि जिन का जिन से विरोध होता है वे दोनों एक दूसरे को उलटा-सीघा कहा ही करते
हैं।

वेद तेरे से बहुत पुराना है और जिसकी बात पूरी (में) से लेकर दूसरी में अधूरी लिखी हो वह उससे पहले का
होता है। लड़कपन में नैमितिक गुण कम थे और स्वाभाविक गुण सब समय एक-से रहते हैं । इस बात को पादरी साहब
ठीक-ठीक नहीं समझे । जो अग्नि के संयोग से जल में ऊष्णता आती है वह नैमित्तिक है और जो अग्नि में कमाता है वह
स्वाभाविक है। जो-जो जीव के स्वाभाविक गुण हैं वे न्यूनाधिक नहीं होते किन्तु नैमितिक न्यूनाधिक होते हैं।

पादरी साहब ने कहा कि कारागार के बंदियों को देखकर देखने वालों को भय होता है कि हम ऐसा कर्म न करें
परन्तु जिसको पूर्वजन्म के कर्मों का दण्ड मिलता है उस को याद ही नहीं। जैसे और लोग कार्य से कारण को जानते हैं क्या
वह न जानेगा ? एक वैद्य को ज्वर आया और एक गंवार को भी । वैद्य ने विद्या से उसका कारण जान लिया कि अमुक
कारण से मुझ को ज्वर है, परन्तु उस गवार ने नहीं जाना यद्यपि ज्वर का कष्ट दोनों के ज्ञान में है। फिर भी गंवार यह कहता
है कि किसी कुपथ्य के कारण मुझ को ज्वर आया है । इस से उसको दण्ड से सुधरने का फल प्राप्त होता है कि जो मैं बरा
कर्म करूगा तो बुरा फल जैसा कि उस को है, मुझ को भी प्राप्त होगा।

उब जीव से जीव और शरीर से शरीर उत्पन्न होते हैं तब तो आपका बनाने वाला परमेश्वर नहीं हुआ। इससे तो
आपका कथन ठीक नहीं रहा और प्रथम-प्रथम आपके कथनानुसार जो जीव हए वे किन-किन जीवों और शरीरो से हुए ।
जो कहें कि परमेश्वर से, तो परमेश्वर भी मनुष्य, घोड़े, वृक्ष और पत्थर के समान हुआ क्योंकि जिसका कार्य जैसा होता है।
उसका कारण भी वैसा ही ही होता है।

Thomas

Here you find some awesome old untold Stories about sports Featured on creditcardnumbersfree.com. So Stay tune with us.

No comments:

Post a Comment