फल असीम(FL Ashim)

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी–स के उदाहरण से मेरा यह अभिप्राय है कि वह जो कुछ रख
है, उसकी स्मृति उसको अपने आप नहीं होती, कहीं किसी के कहने से होती है। और जीव का स्वाभाविक
रहता है परन्तु नैमितिक गुण पटते-बढ़ते रहते हैं। इसलिए जीव एक रा है परन्तु उसके ज्ञान की सामग्री पांच व
बढ़ती जाती है। अब यदि पादरी साहब से या मुझसे कोई पूछे कि दस वर्ष पहले किसी से दिन भर जो बातचीत की।
वह पद और अक्षरों सहित याद है? तो यही कहना पड़ेगा कि ठीक-ठीक याद नहीं।

जब जीव सदा से नहीं आते तो कहां से है ? कारागार के बन्दियों के अपराधों कोे सब लोग यद्यपि ठीक और
नहीं जानते परन्त अनुमान तो करते ही हैं कि किसी अपराध के करने से कारागार में पड़ा है। इसी हेत हम भी अपगध
कर, अन्यथा हमारी भी यही दशा होगी। पादरी राहब मेरे अभिप्राय को नहीं समझे । (मैने जो कहा था) बह स्वप्कीदद
नहीं थी प्रत्युत सुषप्ति की थी कि उस (संपत्ति को) नींद में कछ भी याद नहीं रहता। उस नींद में एक भी बात का कोई
स्मरण नहीं रख सकता। जो पुनर्जन्म नहीं मानते उनकी शिखा से संसार में पाप बढ़ते हैं क्यों (वे सोचते हैं कि आगे तो
जन्म लेना ही नहीं है, जो मन में आवे करते रहो।।

और निरर्थक दौरा सर्द है' अर्थात आज मरा और कयामत (प्रलय) तक वैसे ही हवालात में पड़ा रहा। कचररी
के द्वार बंद है और खुदा बेकार बैठा है। जो नरक में गया
। जो स्वर्ग में गया वह वहीं का हो गया। फिर
कर्म तो सीमा वाले (सीमित) किये जाते हैं परन्तु उसका फल असीम मिलता है। इससे ईश्वर में बहुत अन्याय आता है।
आशावान हुए बिना केवल रंज से मनुष्य सुधर नहीं सकते। (अब प्रश्न है कि) कष्ट का कौन-सा हेतु है? जो सीख के लिए
उस को कष्ट मिलता है, वह उसके सुधार के लिए है । परन्तु उसका फल विद्या आदि हैं। पादरी साहब ने कहा था कि एक
स्थान में सदा सुख भोगेगे तो वह स्थान कौन-सा है और कहां है?

हस्ताक्षर दयानन्द सरस्वती
पादरी स्टेट साहब-कर्नल अल्काट साहब का एक कागज मेरे पास मौजूद है। उसमें ईसाइयोपादरिया और
ईसाई मत के विषय में ऐसे व्यर्थ और कठोर वचन कहे हैं जो मैं किसी बाजारी और बदमाश के लिए भी न कहता। वे
कहते हैं कि ये (ईसाई आदि) वज़रहदय और निर्दय हैं। यह ईसाई मत संसार वे दोषों का आविष्कारक और बुराई बी
यह है। इसके अतिरिक्त और प्रकार के कठोर वचन भी कहे हैं. अब विचार कीजिये कि इस व्यक्ति का हदय और बुद्धि
कैसी होगी ?

रेत में कुर्बानी (यज्ञ) का वर्णन है, इस तथ्य से यह बात सिद्ध नहीं होती कि बेद तीरेत से पराना है। हम दावे से
कह सकते हैं कि यज्ञ का पहले पहल वर्णन उसमें किया गया, वेद वालों ने तीरेत से ले लिया। दोनों बातों का दोनों में बर्न
है । यह कोई नहीं कह सकता कि प्रथम वर्णन किस में हुआ।

यह कहना कि (जीव के कुछ स्वभाव या गुण स्थायी हैं और कुछ (स्थयी) नहीं हैं, इस कारण इस जन्म से वह
(अगले जन्म में) हमें याद नहीं रहतीं । (परन्तु जब कुछ गुण तो स्थायी रहते ही हैं, इसतिए होना ऐसा चाहिये कि कोई बात
तो पुराने जम को याद हो । यदि हमारी और पंडित जी की बातचीत इस वर्ष कटी हुई हो तो कोई-कोई बात तो अब

गाड़ देती है।

आसन्न रोगों के लिए रोशन जज के पास भेजा ।

Thomas

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