बनारस की पाठशाला(bnars)part6

लकेश की सेना की भांति एक आर्यकल्दिवाकर पर टूट फड़े । किसी ने वेदभाष्य पर आद्षेप किये तो किसीने
दियानन्दमतमर्दन और किसी ने दयानन्द मत अमूल ' आदि कुवाव्ययुक्त प्रन्भ रने और यथा नाम तथा गुण अद्थात् दर्वकन:
उन पुस्तकों के भीतर भरे । इन पुराण पाठकों ने पराणं के अच्यन से निश्वय किया कि गालियां ही मनुष्य को सफल
करती हैं । स्वामी जी ने इन सबकी 9्रान्ति अर्यात् सन्देह दूर करने के अर्थ यह ग्रन्थ भ्रान्तिनिवारजग कार्तिक शबला २संबत
१९३४,तदनुसार ७ नवम्बर, सन् १८७७ बुधवार को जब वे पंजाब में विराजमान थे लिखकर आर्यभुषण प्रेस शाहजहांपुर
में छुपाया। आजतक तीन बार प्रकाशित हो चुका है।

२१–यजुर्वेद भाष्य ।
सायणाचार्य का तो यजुर्वेद भाष्य मिलता ही नहीं है '* इसलिए उस पर सम्मति देना ही व्यर्थ है परन्तु महीधर का
है
भाष्य मिलता है और आज के लोगों का पथ प्रदर्शक है। यह बात सुर्य की भांति प्रकट है कि वह वाममागी था * उय्योंकि
उसका बनाया हुआ 'मन्त्रमहोदध ' स्वयं इस बात का साक्षी हैं। इसर वेद का सम्पूर्ण भाष्य स्वामी जी तेयार कर र
चुके हैं
और प्रकाशित भी हो गया है । पौष सुदि १३ संवत १९३४, गुरुवार तदनुसार १७ जनवरी, स्न १८७५ को स्वामी जी ने
इसका आरम्भ किया और मार्गशीर्ष कृ १ सं १९३९ को इसे समाप्त किया। २६३३ पृष्ठको पुस्तक है।

२२-सत्यासत्यविवेक
यह वह लिखित शास्त्रार्थ है जो दिनांक २५., २६२७ अगस्त सन् १८७९,सोमवारमंगलवार, वुधवारतदन्सार
सादी सुदि ७, ८, ९ संवत् १९३६ को पुस्तकालय बरेली में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज और वरेण्ड टी०३०
स्कॉट साहब ' के मध्य पुनर्जन्म, अवतार और पापों की क्षमा के विषयों पर हुआ था। इसमें पादरी साहब की जैसी
असफलता और श्री स्वामी जी महाराज की जसी सफलता हुई हैं, वह इसके अध्ययन करने वाले पर भली-भांति प्रकट हो
जाती है। बड़ी सावधानता से प्रथम बार सितम्बर मास, सन् १८७९ में 'आर्यभूषण' प्रेस शाहजहांपुर में छपा और दूसरी
बार 'आर्य दर्पण' शाहजहांपुर में तथा चौधी और पांचवी बार उर्दू तथा हिन्दी में लाहौर में प्रकाशित हुआ

२३-गोकरुणानिधि
यह ग्रन्थ स्वामी जी ने नैतिक सभ्यता और दयालुता में अत्यंत प्रबल विकार उत्पन्न करने वाले, मांस-भक्षण तथा
मद्यपान-इन दो राज्यों के विरुद्ध लिखा और इसमें इस वैज्ञानिक यग मे केवल शास्त्रीय प्रमाणों से ही काम नहीं लिया
प्रत्युत युक्तियुक्त तर्क के द्वारा इन दोनों के विनाशकारी प्रभावों को संसार के सामने उपस्थित किया। प्रथम बार यह अन्य
नागरी में स्वामी जी ने संवत् १९३७,तदनुसार दिसम्बर, सन् १८८०, गुरुवार को वैदिक यन्त्रालय बनारस से प्रकाशित
कराया। दूसरी बार २० अप्रैल, सन् १८८२ तदनुसार वैशाख,संवत् १९३८ को एक हजार की संख्या में प्रकाशित हुआ
और आज तक पांच बार प्रकाशित हो चुका है।

समाचारपत्र 'भारतमित्र' कलकत्ता ने इस पर निम्नलिखित समीक्षा लिखी है-"हम बहुत धन्यवाद के साथ इस
अपरा पुस्तक की प्राप्ति स्वीकार करते हैं। गोवध निषेध के प्रमाणों के अतिरिक्त भड़, बकरी इत्यादि समस्त जीवों के मांस
खाने की अवैधता इसमें दिखाई है। मूल्य भी इसका बहुत थोड़ा है। इसके साथ गौ आदि पशु-रक्षिणी सभा का नियम भी
छपा है ।उसका नाम सब ऐसे हैं कि धर्म के झगड़ा और मतमतान्तरों का पिट्टन छोड़कर भी प्रत्येक समाज के मनप्य इसमें
सम्मिलित हो सकते हैं। इस बारे में हम लोग यह प्रस्ताव करना चाहते हैं कि देश हितेपी और पशुओं पर टाल

Thomas

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