बनारस की पाठशाला(bnars)part5

देना चाहे कि किस प्रकार दार्शनिक युवतियों से विद्वान् लोग अन्य मत के विद्वानों का मुंह बन्द करते हैं या किस प्रकर
त्रि वेद बाइबिल तथा कुरान पर विजय प्राप्त कर सकता है तो अवश्य इसका अध्ययन को । आज तक आट वा
प्रकाशित हो चुका है और अभी तक यही प्रतीत होता है कि यह प्रथमावृति ही है ।

१७–आय उद्देश्य रत्नमाला
यह पुस्तक इस प्रयोजन से लिखी गई थी कि जब स्वामी जी स्थान-स्थान पर पहुंचते और सत्यधर्म का उपदेश
ते थे तो लोग उसे आर्य सिद्धांत पुछा करते थे और इसकी सरल भाषा की पुस्तक की मांग करते। एक सरल और मट
पुस्तक न होने के कारण प्रायः समय नष्ट करना पड़ता । इस कारण स्वामी जी ने कठिनाई को दूर करने के लिये अमृतरा
निवास के समय श्रावण सुदि ७. बुधवार संवत १९३४ तदनुसार १५ अगस्त, सन् १८७७ को लागाग्राफ चश्मये नूर प्म

अमृतसर में ३० पृष्य की यह पुस्तक प्रकाशित कराई। सूर्यसिद्धान्त जानने के लिये अत्यंत श्रेष्ठ सस्ता और सरल फर
| अच्छा ट्रैक्टर है।

१८–जालंधर-शास्त्रार्थ अर्थात पुनर्जन्म और चमत्कार के विषय में प्रश्नोतर
| यह शास्त्रार्थ स्वामी दयानन्द सरस्वती जी और मौलवी अहमद हसन उर्फ वली मुहम्मद तपाखी के मध्यालय
नगर (पंजाब) में सरदार विक्रमसिंह साहब अहलूवालिया की कोठी पर २४ सितम्बर सन् १८७9 सोमवार तदनुसार २
आज संवत् १९३४ को प्रातः सात बजे हुआ था। इसको उसी समय मिर्जा मुवाहिद जालन्धरी ने पजाबी प्रस में टिम्पम्ब
मार सन् १९७७ में प्रकाशित कराया टूसरी बार आर्य दर्पण के जून तथा जुलाई १८७८वे अंक में प्रकाशित हुआ और
तोर बर मिर्जा मुजाहिद साहब ने अपने वजीरे हिन्द प्रेस सियालकोट में छपवाया। चौथी बार लाहौर और पांचवी बार
आर्यसमाज अमृतसर ने सन् १८८६ में प्रकाशित किया। स्वयं मुसलमानों को निर्णय है कि मौलवी साहब सफल नहीं हुये
और चमत्कार सिद्ध न कर सके।

१९-ऋग्वेद भाष्य
भूमिका के पश्चात् स्वामी जी ने इसकी रचना आरम्भ की। इसके आरम्भ को तिधि मार्गशीर्ष शुक्त ६, संवत् ।
१९२४ सोमवार तदनुसार ११ दिसम्बर, सन् १८९७ है । रोग के आरम्भ होने तक निरन्तर इसमें जी जान से तगे से।
ऋग्वेद तक समाप्त कर लिया था चूंकि सायणाचार्य और मैक्समूलर आदि के अयोग्य और वेदविरुद्ध भाष्यों से संसार में
पर्याप्त अधर्म फला हुआ है अत: स्वामी जी ने जब अच्छी प्रकार मनन किया तो उन्हें निश्चय हो गया कि वेदों या वह
सिद्धांत दो अष-मुनियों ने प्रवर्तित किया था और जो कुछ पूर्वज समझते थे, यह नहीं है जो इस पौराणिक काल में पाया
जादा है, प्रत्युत वह अन्य ही है। आजकल के भाष्यकार पुराणों को आगे रखकर वेद का भाष्य करते है न कि वेद को सामने
रखक। यही बड़ी भारी भूल है जिसके कारण सत्यमार्ग सनातन धर्म से दूर जा पड़ता है। इसी विशेष उद्देश्य को पूर्ण
करने के लिए स्वामी जी ने अपना पृथक भाषा बनाया जिसका वास्तविक अभिप्राय यही है कि वेदों के सिर से मिथ्या कलंक
दूर हो कर ईश्वर की अपार कृपा से वह इस उद्देश्य में पूर्णतया
सफल

२०- भ्रान्ति निवारण' ।
ऊब स्वामी जी ने वेद भाष्य प्रकाशित कराया और उसकी प्रसिद्धि दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी तो मूर्तिपूजक
पण्डितों के औसान जाते रहे । वाममागी, चोलीमागीं, नवीन वेदान्ती ट्ैतवादी वैष्णव शैव नानकपन्धी, चक्राकित शाक्त
स्टिक आदि समस्त
मृर्तिघृजक पण्डित तथा उपर्यक्त विवारधाराओं के विश्वासी अपनी आजीविका को नष्ट होता देखकर

Thomas

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