बनारस की पाठशाला(bnars)part4

एक प्रकार का स्त्री-पुरुष का संयोग है रात्रि का(मित) सुूर्य है वयोकि पह उस में लुप्त होता है । इस (रूपक) के अर्थ मुखे -
ने विपरीत कर लिये हैं ।

|४-वृत्रासुर और इन्द्र की कशा या गाथा थागवत के े रतध में है। ऋग्वेद में एक मन
है । इन्द् नाम सर्य का है, (निपण्टू में देखो) जब सूर्य ने बादल को वद्र के सदश अपनी प्रकाशकिरण से तोड़ा तो वृत्रासुर
अर्थात वादळ, पर्वत और पुष्पी पर आकर उनसे सहायता का प्रार्थी हुआ अथ्थात जल होगकर वहता हुआ समुद्र की अओर
सनल को सूर्य ने अपनी किरणों के साथन से खोवा, बह वाप्य बनकर ऊपर को गया । कभी वृत्रासुर सूर्य
की किरणों को रोकता है, कभी सूर्य की ऊप्यता से जल होकर पृष्वी पर गिरता है। सदा यही अवसर्था रहती है । साराश
नया दल की उत्पत्ति और वर्षा की अवस्था का वर्णन सूर्व और बादल के युद्ध के रूप में किया है।
नव प्रायन समझ कर वह लिख मारा जो बुद्धि के विरुद्ध है । परिणामतः इस प्रकार की बहुत सी
उपमान (रूपक) है, उनमें से एक और बचा भी वेद भाष्य की भूमिका में लिखी हुई है
परिणाम-सत्य यह है कि राजाओं के वचनों को समझने के लिये राजाओं का सा मस्तिष्क चाहिये और पत्रों।
के वचन को समझने को कृषि स्वरों का मस्तिष्क चाहिये राजा और वगीश्वर कभी अयक्त और अनुमान विरुदध वचन
नहीं कहते । व्यभिचारिणी स्त्रियों वाली और पुरुषों को दूषित करने वाली तथा झटो बातें बनाकर ठगने वाली कथा को
बुद्धि विरुद्ध कथा बताते हैं स्वामी जी महाराज की रचना से दएट की दष्टता इस प्रकार दूर हो जायेगी जैसे वायु से मच गधा
के सिर से सींग (आज कल के ब्राह्मणों के सिर से विद्या और सन्तोष तथा राजाओं के मन से साहस और लज्जा । वह
अभागा व्यक्ति होगा जो स्वामी जी महाराज की रचना से वचित रहेगा । आशा है इसी प्रकार हम इस पत्रिका में आपके
पवित्र वचनों को प्रकाशित करते रहेंगे ।

१५-वेदभाष्य का विज्ञापन
स्वामी जी ने जब वेदभाष्य को प्रकाशित कराने का निश्चय किया तो इससे पहले इसको एक ट्रैक्ट के रूप में
प्रकाशित कराया था। इसमें तीन बाते थी, प्रथम-वेद के भाष्य का विज्ञापन पत्र, ८ पृष्ठ, दूसरी—भाष्य के नमूने
का
अंक पृष्ठ २४; तीसरी-गुजराती भाषा के नमूने का अंक तीनों एक साथ मार्गशीर्ष शुकल पूर्णमासी, संवत् १९३३ तदनुसार
१ दिसम्बर सन् १८७६ को प्रकाशित होकर वितरित किये गये।
समाचारपत्रों द्वारा हषोंदगार-इस पर 'इण्डियन मिरर' कलकत्ता ने सम्मति लिखी है-यदि ऐसा बड़ा विद्वान्
जैसा कि पंडित दयानन्द सरस्वती है-वेदों का भाष्य करे तो वह वास्तव में एक अनमोल और आदर के योग्य काम होगा
और हम इस बात को सुनकर बड़े प्रसन्न हैं कि पडित जी ने यह काम आरम्भ कर दिया और बनारस के प्रिण्टिग प्रेस से
संस्कृत में एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ है कि यह भाष्य प्रतिमास प्रकाशित होगा। ग्राहकलोग लाजरस कम्पनी में आवेदनपत्र
भेजें।

१६–सत्यधर्मविचार अर्थात् मेला चांदापुर
यह शास्त्रार्थ स्वामी जी महाराज पादरी टी०जे० स्काट साहब और मौलवी मुहम्मद कासिम साहिब के मध्य दो
दिन तक सहतों मनुष्यों की सभा में बड़े अच्छे ढंग से सम्पन हुआ। इससे मौलवी लोगों और पादरी लोगो की ऐसी प्रत्यक्ष
पराजय हुई कि स्वामी शंकराचार्य के पश्चात् आज तक आर्यावर्त के इतिहास में इस प्रकार का कोई उदाहरण नहीं मिलता।
स्वयं मेले के प्रबन्धको की ओर से यह इसी मास में 'रफाहे आम प्रेस सियालकोट में प्रकाशित हुआ। यदि कोई

Thomas

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