बनारस की पाठशाला(bnars)part3

पह पुस्तक उन धार्मिक सस्कारो को सम्पनन करने के लिये बनाई गई है जिनसे पचेक मनुष्य का गया।
इसमे संस्कार है ये गान से शेखर मर पर्यन्त करने योग्य है। इसके अध्ययन से प्रकट हो । प्राचीन
किस आकार इस संसार में अपनी देवप्रयाग को पूरा करते थे। यह अन्य स्वामी ने पुराने f५ नियों 100 से
संस्कार सम्बन्धी पुस्तक से सुबह' करके बनाई है। इसको प्रत्येक गृहस्य के घर में आवश्यकता है। पहली बार
एशियाटिक प्रेस बम्बई में संवत १९३ १ विक्रमी तदनुसार १७९८ शालिवाहन तदनुसार सन् १८७७ में एक ही
संख्या में प्रकाशित हुई थी। यह घन्य कार्तिक कृष्ण अमावस्या शनिवार, संवत् १९३२, दिनुसार १३ नवम्या सन्
१८७५ को दिखा जाना आरम्भ हुआ और पौष सुदी दशमी, संवत् १९३२, सोमवार तदनसार ३ जनवरी, सन् १८७४
को पूर्ण हुआ। दूसरी बार स्वामी जी ने अपने जीवनकाल में इसको कई स्थानों पर ठोक करके षाड़ यदि १३सध।
१९४०, रविवार तदनुसार १ जुलाई, सन् १८८३ को प्रेस में दिया। आज तक तीन बार प्रकाशित हो चुकी है।
संस्कार विधि की समीक्षा--अंग्रेजी समाचार पत्र इंडियन मिरर कलकत्ता में संस्कारविधि पर निम्नलिखित
समीक्षा प्रकाशित हुई है-'पण्डित दयानन्द सरस्वती जी ने मूल वेदों में से संस्कारों की एक पुस्तक तैयार की है ताकि जो
तो अपने घरेलू संस्कारों और जाति की प्रिया के वर्तमान मूर्तिपूजा को रीति से नहीं करना चाहते, वे इस पुस्तक के
अनुसार का सके। ये पण्डित जी वास्तव में पूर्ण हद से मूर्तिपूजा को दूर करने में तत्पर है ।इस उदेश्य को पूरा करने के
ये जो प्रयत्त और आत्यवतिदार वे कर रहे हैं वह निस्सदेह प्रत्येक जाति के अनुकरण करने योग्य है। हमको सूचना
मिली है कि हरिश्चन्द्र चिन्तामणि बम्बई वाले ने अपने पिता का मुतकसरकार उस विद्वान् पण्डित की बताई गई वैदिक रीति
के अनुसार किया है । (२५ जून सन् १८७६, खंड १५. संख्या १४९, संडे एडीशन, कोतम ४, पृष्ठ १)।।

१३–वेद भाष्य भूमिका
यह ग्रन्थ वेद भाष्य की भूमिका है। स्वामी जी ने इसमें पूर्ण योग्यता और श्रेष्ठता के साथ वैदिक धर्म सम्बन्धी
समस्त शंकाओं और झटी प्रान्तियों का पर्वत खंडन किया है। भादों शुक्ल संवत् १९३३, रविवार तदनुसार २० अगस्त,
सन् १८७६ से इसका आरम्भ करके संवत १९३५ को समाप्त किया है। लाजरस प्रेस बनारस में २७६ पृष्ठों में प्रकाशित
है है।'"उच्चकोटि की विद्यासम्बन्धी योग्यता की पुस्तक आद्योपान्त दर्शनीय है। इस पर मुंशी कन्हैयालाल साहब ने
निम्मतिहबित समिधा की है-

श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का वेदों के रहस्य और शास्त्र में लिखित गाथाओं के सप्न्य में लेख-
१-'प्रजापति' सूर्य का नाम है। गाथा लेखक ने उषा देवता को उसकी कन्या कल्पित विया है देवता का
अर्थ प्रकाश स्वरूप है; उपा का अर्थ प्रातःकाल है। सूर्य ने किरणों (द्वारा अपना प्रकाश डाला, उसको 'वीर्य'कल्पित किया।
उससे दिन अर्थात् आदित्य उत्पन्न हुआ।
२-पर्जन्य अर्थात् बादल को पिता बताया और पृथ्वी को कन्या । उब बादत ने पृष्ी पर जल बरसाया तो उसको
वोयं कहा उससे कृषि और सब अन्य पदार्थ उत्पन्न हये। इस उपमा को मुख ने विरुद्ध लिखकर प्रसिद्ध किया जिससे दोष
लगता है।

३-इंद्र ने गौतम की पत्नी अहिल्या से भोग किया। इस गाथा में इन्द्र सूर्य का नाम और गौतम चन्द्रमा का नाम
है, और रात्रि नाम अहिल्या है। क्योंकि अपर नाम दिन का है और वह रात्रि में तय अर्थात् लप्त होता है। मानो यह

Thomas

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