बनारस की पाठशाला(bnars)part2

पाता। जो न एताशा के लिये कृतसंकल्प अर्थप्न्थों की स्वामी जी की मान्यता के
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। नाने पाठशाला ।। नये सिरे से प्रवन्ध करने
लिया पा कt नछ काल वहीं रहकर सब प्रकार का प्रवन्ध करना ठान लिलिया था । इस सुभ इच्छा को पृर्ण करने के लिये
जाग ३० ला १८७४ मारना नंगा' था। पारित कराया बसता
।। (थ' ।। धार (ती है।

बिहार खन्धु (सवि १४ संवत् १९३१ विक्रमी) -'कवि वचन सुधा दिनांक २० जुलाई में आपका विज्ञापन पत्र
(पा है इसे हम यहां बड़ी ही प्रसन्नता से है। 'विज्ञापन पत्रकार राईको विदित हो कि आपका आर्य विधालय।
काशी में सवत् १९३० पौध ut तदनुसार दिसम्बर सन् १८७३ में केदरधाट पर आरम्भ हुआ गा वही अब मित्रपुर भैरवी
।। ॥ तुषार मित्र के स्थमान में १९३१ गति आणाव गति ५ शुक्रवार, १९ जून सन् १८७८ को प्रातhकात
७ ॥ ॥ अपना 31 हो।।। इसका प्रबंध भव भक्ति परका होगा । प्रात७ बजे से पठन और पाठन होगा दस ग्यारह

मनगर र १ वजे से निधो गया। राणे अध्यापक गणेश श्रोत्रिय जी रहेगे सो पूर्वमीमांसा वैशेषिक, न्याय
ज। शाखा, वेदारिश के उप मंडप, चाहिए, तैत्तिरीय ऐतरेय छान्दोग्य बृहदारण्यक दश उपनिषद्,
गुरु। सत्यापन र पाराशर ॥ गणा -ये पग पाये जाते थोड़े समय पीछे चार वेद चार उपवेद तथा
॥ ॥ ॥ भी पाये जायेंगे और एक उप व्याकरण रहेगा वह अष्टध्यायी, धातुपाठ गण आदि गणशिक्षा और
॥५॥ गणप-थे पाच पाणिनि पुति और पतंजलि पित महाभाष्य पिंगल मुनि का दोन्र याकमुनिका
विश्वत और काव्य अलंकार सुर भाष्य इन सब को पढ़ना होमा जिनको पढ़ने की इच्छा होये सो आकर पढे ।जो विद्या
और विचार की परीक्षा में उत्तम होगा उस की परीक्षा के पीछे पारितोषिक यथायोग्य मिलेगा। सो परीक्षा प्रतिमास हुआ
कोगी। इ॥ धाu fi। और वैश्य सब पड़ेगे वेद पर्यन और शुद्र मंत्र भाग को छोड़ के सब शास्त्र पढेगे। फिर
उप-वक इस आर्य विद्यालय के लिए अधिक-भधिक पन्दा होाा तब तक अध्यापक और विद्यार्थी लोगों को भी पदादा
जायेगा ।इसकी रखा और गर्दन के लिये ए आर्यसभा स्थापित हई है और एक 'आर्यप्रकाश पत्र भी निकतेगा मास-यास
में इन बातों को पत। लिये व भद्रा सोंग प्रवृत्त हये हैं और बहुत प्रवृत्त होगे । इससे हो आर्यावर्त देश की उनति
होगी । इस विद्यालय मे वधाधत शिक्षा दी जाएगी जिससे सब उत्तम व्यवहारयुक्त होंगे।

(ग) स्वामी दयानन्द सरस्वती (विहारबन्धु खंड २, संख्या २१.८ जुलाई, सन् १८०४ ।
राशि का है। बनारस में दो मास रहकर और पाठशाला का नये सिरे से नियमपूर्वक प्रबन्ध जराके जत्ई
मार स् १८७३ के ध् में स्वामी जी प्रयाग पधारे और वहां से बम्बई की ओर चले गये।

| पोषक दीप समाज इलाका व पडित हेमचन्द्र पति'' को स्वामी जी से शिक्षा प्राप्त करने के
पाय ॥ पपा आया था वह अपनी या पुस्तक में लिखता है-जप हम कानपर गये तो वहा पति पर
भम्ती हे हमारी घेर हा । उन्होंने काशी में एक वैदिक सर्वधर्म पाठशाता माष महोने के शक्तपस् से समापन किया है
यह त्होने हम से । और यह भी कहा कि लोगों के इसके लिये बहुत सहायता दो । रूवामी जो के दरे से इस देश में
वारा । ।।(रास अपनी कंपनी बेरा से संवाद ३६ व ३६।।
की का एक पास पाठशाला के विषय में स्वामी ने अपनी एक चिो मे मिति २३ जनवरी पर

।५७५ में लालो हरबराताल कायस्थ को बनारस में निम्न सील

Thomas

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