बनारस की पाठशाला(bnars)

बनारस की पाठशाला

पाठशाला की स्थापना-अस्सी घाट, बनारस निवासी साधु जवाहर दास उदासी ने वर्णन किया_“पक
जी ने हमको मिर्जापुर बलिया और जब हम वहां पहुंचे तो हमसे कहा कि हम काशी में पाठशाला स्थापित करा
आप उसकी देखभाल स्वीकार करे हमने स्वीकार किया और परस्पर सम्मति से हम बनारस से पूर्व को और स्वा
बनारस से पश्चिम को चन्दे के लिये गये । हम इमरान, आरा, छपरा, पटना आदि नगरों में फिर कर लगभग दो मार
४० रुपये मासिक चन्दा लिखवा कर और दो मास के ८० रुपये अगाऊ लेकर बनारस लौटे और यहां आकर वह ८० रुप
स्वामी जी के पास भिजवाये । स्वामी जी ने उसके सौ रुपये करके हमारे पास वापस भेजे कि तुम इससे काम करो पीछे
और भेजेंगे। उस रुपये के आने पर हमने पौष बदि द्वितीया संवत् १९३० विक्रमी तदनुसार ६ दिसम्बर, सन् १८
सोमवार को केदार के मन्दिर के पास एक मकान ३ रु० १२ आने मासिक किराये पर लेकर पाठशाला स्थापित की। पंडित
शिवकुमार शास्त्री २५ रुपये मासिक वेतन पर व्याकरण पढ़ाने के लिये नियत किये गये । पहले दिन पांच रुपये की मिठाई
निम्नलिखित पडितो को दी गई पंडित शिवकुमार, पंडित हरिकिशन,पंडित विद्याधर, पंडित व्यास जी, पंडित गणेश श्रोत्रिय ।
पंडित मुरलीधर, पंडित हरबंस सहाय पंडित हरिप्रसाद और एक अन्य पंडित को एक-एक रुपया दक्षिणा सहित दो गई।
पंडित शिवकुमार जी व्याकरण पढ़ाते थे और हम तीसरे पहर जाकर योगभाष्य और न्यायदर्शन पढ़ाते थे । इ मास तक
पाठशाला हम चलाते रहे इसके पश्चात् स्वामी जी आये और सरजूप्रसाद बनिये के बगीचे में उतरे, पाठशाला को देखा
और सब परीक्षा ली। शिवकुमार को कहा कि तुम आर्य धर्म का उपदेश दिया करो। उसने कहा कि इस वेतन पर गह
यदि पचास रुपया दो तो ऐसा कर सकता हूं क्योंकि ऐसा करने से मेरी उपजीविका की हानि होती है ।वास्तव में बह वेद
का जानने वाला नहीं था, इसलिये स्वामी जी ने उसे हटा कर पंडित गणेश श्रोत्रिय को हमारे द्वारा बुलवा कर १५ रुपये

मासिक पर नियत किया। इस बार स्वामी जी दो मास रहे, आम का मौसम था और गर्मी को ऋतु थी।

कानपुर निवासी बाबू शिवसहाय गौड़-ब्राह्मण ने वर्णन किया -"मझे स्वामी जी ने बनारस की पाठशाला के
लिये जिस का दूसरा नाम 'सत्य शास्त्र पाठशाला' था-चंदा उगाहने के लिये कानपुर, लखनऊ, फरूखाबाद, शुरुल्लापुर
की ओर भेजा था और एक चिट्ठी प्रमाण पत्र के रूप में चन्दा प्राप्ति के अधिकार में दी धी ।*

इसी पाठशाला के सम्बन्य में स्वामी जी की दूसरी चिट्ठी २९ मई, सन् १८७४ शुक्रवार को इस प्रकार है
स्वामी दयानन्द की आशीष पहुंचे। आगे सदि ७ का लिखा पत्र पहुंचा, समाचार भी विदित हुआ। यहां एक मास तक तो
हमारी स्थिति होगी, सो जानना। यहां की पाठशाला का प्रबन्ध बहुत अच्छा है । एक छ शास्त्रों को पढ़ाने वाला बहुत उतमें
अध्यापक रखा गया है. वैसा ही एक वैयाकरण नियुक्त किया गया है । दशाश्वमेध पर स्थान लिया गया है बहत उतम
उस में पाठशाला पूर्णमासी के पीछे बैठेगी। केदारघाट का स्थान अच्छा नहीं बा इससे अब हमारे पास बाग में पाठशाला
है, अच्छे-अच्छे विद्यार्थी भी पढ़ते हैं, सो जानना। आगे तुम पत्र देखते ही रुपया और पुस्तक शीघ्र भेज दो, विलम्ब शणमातर
भी मत करना । दिनेशराम को एक महाभाष्य पुस्तक देकर शेष सब पुस्तक यहां भेज दो। जो दिनेशराम न दे तो फिर देखा
जायेगा। तुम अपने पास के पुस्तक और रुपये-यह हड्डी कराके शीघ्र भेज दो। आगे गोपाल व अन्य को पढ़ने की इच्छा
होवे तो चला आवे । ब्रह्मचारी लक्ष्मीनारायण यहां अब तक नहीं आया और न कोई तुम्हारा पत्र किनु यह पत्र आया, इसका
यह उत्तर जानना ।सब यहां आनन्द मंगल है और पंडित जुगलकिशोर महता गोपालदत और दिनेशराम आदि को भी।
हमारा प्रत्यभिवादन कह देना । संवत् १९३१. मिति ज्येष्ठ सुदि १३, शुक्रवार

Thomas

Here you find some awesome old untold Stories about sports Featured on creditcardnumbersfree.com. So Stay tune with us.

No comments:

Post a Comment