भड़ास निकाल(bdash Nikal)part5

बात बनाते और शास्त्रार्थ की हीग मारते थेउस ओर मुख तक न किया वयो न हो, शास्त्रार्थ करना।
यद्यपि इतना तो हुआ कि जिन सज्जनों को कछ पूछना गा, वे इन दिनों में आकर निरन्तर अपने
संदेह मिटाते रहे और कुछ विद्याहीन लोग जिन्हें न समझने की योग्यता थी और कहने का तुग आता था वे अपना नित्य
का समय नष्ट ही करते रहे।

सारांश यह है कि स्वामी जी के उपदेशों ने देश के शभविन्तकों के हदवों पर प्रभाव डाला और देशोनति तवा
किया जिससे परस्पर यह निश्चय हआ कि एक समाज आगरा नगर म (गोकुलपुरा में सिथित
आर्यसमाज के अतिरिक्त-जो नगर से बहुत दूर है और जहां मार्ग लम्बा होने के कारण नगर वाला का आना-जाना वम
किया जावे। इस सम्बन्ध में २६दिसम्बर सन १८८० रविवार को एक सभा हुई और आगरा नगर में
आर्य समाज की नींव रखी गई।

व्याख्या का दूसरा क्रम-२३ जनवरी, सन १८८१ से स्वामी जी ने व्याख्यानों का दूसरा क्रम आरम्भ किया।
इस सम्बन्ध में लिखा है-२३ ता० को शाम से स्वामी दयानन्द के व्याख्यान फिर आरम्भ हुए।(नाम आगरा, पृष्ठ
२३, २३ जनवरी, सन् १८८१.खंड, संख्या ३)

स्वामी दयानन्द सरस्वती महाराज के व्याख्यानों का दूसरा क्रम २९ जनवरी, सन् १८८१ को समाप्त हुआ।
नसीम आगरा, ३० जनवरी, सन् १८८१. पृष्ठ ३१)

दूसरे क्रम में कुल सात व्याख्यान हुए।

"स्वामी दयानन्द अभी तक यही हैं। मुंशी इन्द्रमणि भी कुछ दिनों के लिए यहां आये थे। (आगरे से निज
संवाददाता द्वारा) 1(कवे वचन सधा', ३१ जनवरी, सन् १८८१, खंड १२, संख्या २६)।

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी अभी तक यहां उपस्थित है और प्रति रविवार को कोठी न० १३४ सेव के बाजार
में रात्रि के समय व्याख्यान हुआ करता है।"(भारती विलास', आगरा, २५ फरवरी, सन् १८८१)।

"रविवार, ता० २७ फरवरी, सन् १८८१ की रात को स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का व्याख्यान सेब के बाजार
में हुआ ।” (नसीम, आगरा, २८ फरवरी, सन् १८८१,संख्या ८, पृष्ठ ६३) ।

“श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज का व्याख्यान ता० ६ मार्च, रविवार को सेब के बाजार में हुआ (नसीम'
आगरा, ७ मार्च, सन् १८८१. संख्या ९, पृष्ठ ७१) ।
मुंशी गिरधारी लाल साहब वकील ने वर्णन किया-सन् १८८० के अन्त में स्वर्गोय मुशी तत्मणप्रसाद पेशनर
प्रोफेसर बरेली कॉलेज और कुछ अन्य सज्जनों ने स्वामी जी को मेरठ से बुलाने का प्रस्ताव किया और सम्मति हुई कि
नगर से बाहर किसी मकान में उन्हें ठहराया जावे। जिस रात की गाड़ी में उनको आना था, उस पर वे लोग उपस्थित पहीं
हुए। चूंकि मुझे भी सूचना मिली थी, मैं स्टेशन पर उपस्थित था। उस मकान के ज्ञात न होने के कारण मैं स्वामी जी को
अपने मकान पर ले आया। दूसरे दिन वे लोग उपस्थित हुए और अनुपस्थिति को क्षमा मांग कर निश्चित मकान पर जाने
की सहमति हुई परन्तु स्वामी जी ने मुझसे कहा कि यदि तुमको कष्ट न हो तो हमको यह मकान पसन्द है। मैंने अत्यन्त
प्रसन्नता से स्वीकार किया। फिर मैंने यह भी कहा कि आप जब तक यहां हैं, भोजन आदि का व्यय में उठाऊंगा।
स्वामी जी ने कहा कि हमारा यह नियम नहीं कि व्यय का भार किसी एक मनुष्य पर डाले । हमारे पास सामान मौजूद है,
कहार, ब्राह्मणादि साथ हैं, हम स्वयं प्रबंधन करेंगे। हां, जो कभी कुछ आवश्यकता होगी, कह दिया जावेगा। इसी

Thomas

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