भड़ास निकाल(bdash Nikal)part4

{क। ५। । (क) र व्या । (कर पय पर स्वामी या शास्त्रार्थ न हुआ। और कुछ समारपत्र में जा
था । । ।।।।।।।।।। गत (या (२॥ (दरार, १८८०, uc 3, राग ३५) ।

।" ।।।) एक रासा अपाय हो । जैसे पति का अभिप्राप्त गली ।। दयानन्द
मरस का प्रा। म न कोड ॥ ताड़ देता है।" (चरी' आगरा, पुस ५८५, २३ दिसम्बर, सन् १८८०)।
*तo २२ दिसम्बर, सन् १८८० को भी स्वामी दयानन्द सरस्वती के व्याख्यानों का क्रम समाप्त हुआ और उसके
पश्चात् दस दिन का अवकाश इस अधिकार से दिया गया कि जिन सज्जनों को गुछ शका या सदेह हो, वे पांच बजे राय
से दस बजे रा रा रा पर शास्त्रार्थ कर ले परन्तु अभी तक कोई विद्वतापूर्ण शास्त्रार्थ नहीं हुआ । कुछ सज्जन ने यह
अब लिखा था कि गंगा जी में कोई गति में उनसे शास्त्रार्थ हो । उक्त स्वामी जी ने उसका यह उत्तर दिया कि वास्तव
में से एक ऐसे पक्षी है कि।जिसकी अब तक कोई प्रसिकद्धि नहीं है और न उनकी दत्ता का ही अभी तक कोई नगळ
देखने में आया है। यदि ये महसे किसी विषय में शास्त्रार्थ करना चाहते हैं तो उनका यहां पघारना हमारी प्रसन्नता का काण
होगा परन्नु मथुरा जाना उसी दशा में उचित हो सकता है जब उक्त पति की योग्यता केविपय में यह पूर्ण विश्वास हो,
आगे (Kा अपारण है। दिल्ली गजट' ने इस सम्बन्ध में जो गह निलि और निरर्धक लेखलिखा है कि स्वामी
जी मथुरा जाने से इन्कार करते हैं, वह सर्विया मिष्या है व्योकि इस बात का विश्वास किये बिना कि कोई विद्वान् किसी
विषय में शास्त्रार्थ की इच्छा रखता है, मथुरा में कि जहा पर बहुत से असभ्य लोग उन के शत्रु हैं और एक बार उन पर
आपण भी कर चुके हैं, उनका जाना व्यवहार के विरुद्ध है। यदि वास्तव में किसी को किसी विषय में सन्देह हो तो वह
शिष्टता से शास्त्रार्थ करने को उद्यत है। हमारी सम्मति में इस बात का अनुरोध करने वालों को उचित है कि जिस किसी को
वह इस योग्य समझे, उसको आगरा में बुला ले ताकि एक विशाल जनसमूह के सामने इस बात का निर्णय हो जाने और
लोगों का सन्देह दूर हो जावे।"नसीम' आगरा ३० दिसम्बर सन् १८८०,खंड ३, संया ३६, पृष्ठ २८७)।

२२ से २८ ता० तक का तो यह खतात रहा । इसके पश्चात् स्वामी जी के लगातार २५ व्याख्यान निम्नलिखित
विषयों पर हुए दिनांक २८ नवम्बर–धर्म का स्वरूप। २९ नवम्बर–परमेश्वर की वास्तविकता और विशेषता । ३०
नवम्बर व १ दिसम्बर-सृष्टि-उत्पत्ति और आदिष्टि का वृत्तान्त । २ व ३ दिसम्बर–पवित्र वेद के ईश्वरोक्त होने का प्रमाण
और मैक्समूलर
महीधर के भाष्यों का खंडन ।दिसम्बर-संस्कारों का महत्व, गर्भाधान से लेकर आठवें संस्कार
तक वर्णन किया । ५ दिसम्बर–विवाह संस्कार । ६ दिसम्बर–नियोग और संन्यास । ७ दिसम्बर–पंचमहायज्ञों का
महत्व और उनके करने पर बल दिया गया। ८ व ९ दिसम्बर–मूर्तिपूजन का खंडन, निरन्तर दो दिन तक प्रभावशाली
व्याख्यान दिया। १० व ११ दिसम्बर–पुनर्जन्म और जन्म-मरण का वृत्तान्त । १२ दिसम्बर—पृथिवी आदि लोको के
परिक्रमण और परस्पर आकर्षण, इस सम्बन्ध में शास्त्रों का मंडन और पुराणों का खंडन । १३ दिसम्बर–राजाप्रजोधर्म,
राज्यव्यवस्था और अधिकार । १४ व १५ दिसम्बर–उपासना और प्रार्थना की आवश्यकता, उनके गुण तथा करने की
| विधि। १६ व १७ दिसम्बर–मुक्ति का स्वरूप और उसके साधन । १८ दिसम्बर–समस्त व्याख्यानों का सार । १९
दिसम्बर–खान-पान का विचार । २० दिसम्बर–गोवध की असीम हानियां और गोरक्षा के असंख्य लाभ । २१ व २२
दिसम्बर–सभा और सोसाइटी के नियमों का वर्णन किया । पहले क्रम के व्याख्यान समाप्त करके सबको सना दिया और
विज्ञापन द्वारा प्रकाशित कर दिया कि अब जिस किसी को मुझसे शास्त्रार्थ की इच्छा हो या मेरे कथन में किसी बात पर कुछ
पन्देह हो या निजी रूप में कुछ पूछने का अभिप्राय हो तो आज से लेकर दस दिन तक मेरे निवासस्थान पर आकर अपना
नन्तोष कर ले अर्थात् शंकाएं उपस्थित करें और उनके उत्तर सन लें । परन्तु आकर बातचीत करना तो एक ओर, किसी

Thomas

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