भड़ास निकाल(bdash Nikal)part3

आगरा नगर में पधारने का वृत्तान्त

(२५ नवम्बर, "* सन् १८८० १० मार्च, सन् १८4१ तक)
समाचार पत्र निसीम' आगरा में लिखा है...*आज कल कहा पर दयानन्द खरगोश के पचारने की खर्चा है। औ
(२० नवम्बर सन् १८८०, खंड ३, संख्या ३२. पृष्ठ २२५)

विदित हो कि स्वामी जी देहरादून से २० नवम्बर को चलकर २१ को मेरठ पहुंधे और वहीं से २८ की रात को
चलकर २५ नवम्बर सन् १८८० को आगरा पहुंचकर ला० गिरधारीलाल जी भार्गव वकील के मकान पीठो । त्रि।
उनके आगमन का समाचार सर्वसाधारण में फैल गया और उनके पधारने की धम समीप और दूर सब स्थानों में मच गई।
दो दिन के पश्चात(जो मिलने मिलाने में कटे और व्याख्यानादि के प्रबन्ध में बीत गये) २८ नवम्बर, सन् १८८० को यामी।
जी का उपदेश आरम्भ हुआ।

'साम आगरा में लिया है—२५ नवम्बर को स्वामी दयानन्द सरस्वती नौ वजे रात के समय पर से पर।
और २८, २९ और ३० ता० को भूतपूर्व पाठशाला फिटे आम' के मकान में व्याख्यान दिया। श्रोताओं की भीड़ अत्यधिक
थी और व्याख्यान भी प्रशंसनीय है।"(३० नवम्बर, संख्या ३३३, पृष्ठ २६३) ।
दस दिन पश्चात् के दूसरे अंक में लिखा है-*स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने दस दिनों में प्रतिदिन लगातार
व्याख्यान दिये और श्रोताओं में से कुछ को छोड़कर शेष सब उनके प्रभावपूर्ण व्याख्यानों से आनन्दित होते रहे।
की रात: को ठाकुर श्याम सिंह के यहां उक्त स्वामी जी ने एक छोटा-सा हवन कराया और पृथिवी खोद कर बेदी
बनवाई। उस समय बहुत से मनुष्य एकत्रित थे । उक्त ठाकर के तीनतड़कों को यज्ञोपवीत वेद के अनार कराया । हलये
और कुछ सुगन्धित पदार्थ से आहुति दिलाई। उपस्थित ब्राह्मणों को भी एक रुपया से लेकर चार आने तक दक्षिणा दिलाई
गई और इसके अतिरिक्त परोपकार के लिए उक्त ठाकुर से कछ धनराशि अलग जमा कराई गई। (१० दिसम्बर, सन्
१८८०,खंड ३, संख्या ३४)।

पंडित श्री नारायण, मुंसिफ आगरा ने वर्णन किया-*एक मेम साहब भी इस अग्निहोत्र को देखने आई थी
जो रोमन कैथोलिक वर्ष की थी ।*

फिर इसी समाचारपत्र में लिखा है “स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज का व्याख्यान नियत समय पर प्रतिदिन
होता है। वास्तव में उक्त स्वामी जी का भाषण सर्वथा दृढ़ आधारस्थ तथा उत्कृष्ट होता है; और उसय हेतु परोपकार होता
है।
। चालू महीने की १२ ता० को कैथोलिक वर्ष के बड़े पादरी साहब की इच्छानुसार प्रशसनीय स्वामी जी बड़े गिजे में
पघारे । उनके साथ प्रतिष्ठित वकील उच्च पदाधिकारी तथा अन्य कुछ सजन भी वहां गये थे। पादरी साहब सज शे
रीति के अनुसार उनसे मिले और बहुत काल तक अपनी परिस्थिति तथा धर्म की बातें करते रहे और अपनी बातचीत के
बीच में यह भी कहा कि उच्च पादरी छोटे ईश्वर के रूप में समझा जाता है और जो कोई भूल हम लोगों से ही उसका सुधार
उच्च पादरी अर्थात् रोम के पोप द्वारा होता है परन्तु पोपसाहब की भूल के विषय में वे किसी उपयुक्त युक्ति से दोताओं
का सन्तोष न कर सके । वेद के विषय में जो कुछ स्वामी जी से पूछा गया उस वा अत्यन्त युक्तियुग और प्रेत उतर
प्रशंसनीय स्वामी जी ने दिया, यद्यपि बहुत थोड़ा समय उसके उत्तर के लिए था। तत्पश्चात् गिजे को देखकर उकास्मी
जी लौट आये। दो तीन बार यहां के पंडिता ने इस विचार से सभा को थी कि स्वामी जी से धार्मिक शास्त्रार्थ किया ये
परन्तु उसका कोई परिणाम प्रकट नहीं हुआ और न इस विषय में अभी तक संकल्प को बता पाई जाती है।

Thomas

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