भड़ास निकाल(bdash Nikal)part2

उत्तर लीजिये, पीछे हग को आरोप करने दीजिये और उत्तर प्रदान कीजिये । इस के अतिरिकत देहरादून के समस्त रईस
3र सज्जना को भली भाति विदित हो गया । इन पारी लोगों को केवल आप मनुष्य को ही बहकाना आता है ।।
विद्वान के सामने इन लोगों ने कभी कि। रशन पर शारार्थ न किया और दि टावित किया भी तो नाम नहीं पाया।
बस अब और अधिक इस विषय में कहाँ तक लिख ?7 सम्मानित पाटक वास्तविकता को इतने कथन से ही स्वयं समझ
सकते हैं और सत्यासत्य का विवाह कर सकते हैं।"

"इस बीच में मुंशी मुहम्मद उमर'**साहब को जो गत वर्ष से देहरादून आर्यसमाज में सम्मिलित हैं और जिन का
वर्तमान नाम अलख धारी है, मुसलमानों ने जा पकड़ा और कहा कि तेरी मुक्ति असम्भव है और तू अत्यन्त दु:ख पाने का
अधिकारी और कष्ट उठाने के योग्य है । उसके उत्तर में उक्त मंशी साहब ने, जो आजकल के मुसलमानों में से एक स्मरणीय,
सत्यप्रिय तथा सदाचारी व्यक्ति है. उन आक्षेप करने वाले विरोधियों से प्रश्न किया कि आपका ईश्वर सारे संसार का
पालनकर्ता है या केवल मुसलमानों का ? पहली अवस्था में तो कल्याण के विषय में मेरी अपेक्षा आप में कोई विशेषता है
ही नहीं और जो दूसरा विचार है वह तो केवल बकवास है। अच्छा तो यही है कि आप लोग भी पवित्र वेद पर विश्वास
कर और सत्य धर्म को ही सत्य बनें अन्यथा छुटकारा कठिन है। आगे आपको अधिकार है।
बहुत से लोग जो बिना देखे भाले स्वामी जी के विषय में अशिष्ट शब्द,चाहे पक्षपात से अथवा और किसी करण
जिद्वा पर लाते थे, उनके व्याख्यान सुनते ही और उनसे बातचीत करते ही सत्यमार्ग पर आ गये, अपनी भूल पर लज्जित
हुए और कहने लगे कि हमने झूठे समाचार सुनकर स्वामी जी के विषय में कुछ और ही समझ रखा था परन्तु यहां तो बात
ही और निकली । किन्तु हठी लोग हठ कमी के कारण, मुसलमान और ईसाई लोग कुरान और इजील के खंडन के कारण
आजकल के ब्राह्मण लोग अपनी आजीविका की चिंता के कारण व्यभिचारी, दुराचारी और असत्यवादी लोग दष्कर्मों के
प्रति अपने मोहवश, अब भी स्वामी जी को बुरा-भला कहे जाते हैं । रहे सत्यप्रिय और दूरदर्शी लोग वे तो पहले ही से इस
परिवर्तनशील समय में स्वामी जी को एक महान विभूति समझते हैं । विचार था कि स्वामी जी के व्याख्यानों का विस्तारपूर्वक
वृतांत भी यहां लिखूं परन्तु प्रथम तो उन का विस्तारसहित लिखना तनिक कठिन है, दूसरे उनमें से बहत से स्वामी जी की
रचनाओं में मौजूद हैं इसलिए इस को छोड़ता हूँ और वर्तमान लेख को इस प्रार्थना पर कि परमेश्वर अविद्या का नाश करके
से
धर्म का प्रकाश करें, समाप्त करता हूं। ((आर्य समाचार मेरठ, पृष्ठ २४२ उद्भत) इति ।

कृपाराम मंत्री, आर्य समाज देहरादून
('आर्य समाचार', मार्गशीर्ष मास, संवत् १९३७ तदनुसार नवम्बर, सन् १८८०,पृष्ठ २४२ से २५० तक)।
मेरठ का वृत्तान्त-स्वामी जी देहरादून से चलकर मेरठ पधारे जैसा कि वे अपने एक पत्र में लिखते हैं, "ला०
कालीचरण जी व रामरतन जी, आनन्दित रहो मैं देहरादून से यहां आया। चौबे तोताराम के प्रमाद से पस्तको की हानि
हो जाएगी । यहां से दो-चार दिनों में आगरा जाऊंगा, वहा मैं एक महीना ठहरूंगा और मास्टर शादीराम जी की जमानत
ला० रामसरनदास जी ने दे दी और मुंशी बख्तावर सिंह जी की चिट्ठियों से विदित हुआ कि उनके ऊपर कानून से पेश आना
चाहिये रसों ठाकर मुकन्दसिह जी व भूपालसिंह जी मुख्तार है, सब काम कर लेंगे। वैदिक यन्त्रालय के प्रबन्ध में
मुंशी बख्तावर सिंह के कारण खराबी आ रही थी। उसका प्रबंधन भी करते रहे। पांच दिन रहे, कोई व्याख्यान नहीं हुआ।
नवम्बर, सन् १८८० को पंडित भीमसेन जी ने वैदिक यत्रालय का चार्ज बनारस में ले लिया

Thomas

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