भड़ास निकाल(bdash Nikal)

आ और पूर्ववत् डरते रहे । तब स्वामी जी ने कहा कि आप इस गा आपके तो रो पग मा पक्रात 87 ला"

पहले आप धद पर दस प्रश्न तक कर लीजिये और ततर
सुनने के पश्चात् मदा को हईील पर अआरोप करे की आश दीजिये
* सुनने वाला को आनन्द आवे, सत्य और शूट की वारामिण प्रकट । लिगा राज | |
अपनी कसे जाव र दूसरे की न सने । इस पर पादरी साहब वो भी रोग और आय उन्न वारी ।
कहा कि बहुत अचन । परन्तु जिस समय इन्जाल पर आक्षेप किये जाने की घटी आई और लिखने की अवस्था छ
तब तो पादरी साहब को विचित्र दशा हुई अर्थात् वही मुसलमान लोगों की री रट लगाये गये जाते जिव तक।
अपने प्रश्न के उत्तर से सन्तोष प्राप्त कर लेंगे और उसकी स्वीकति न दे देगे तब तक न हम तुमको कोलने दगे अार न
तुम्हारी सुनेगे । यह देखकर स्वामी जी ने कहा कि आप अपने प्रश्न के विषय में तो कहते हैं परन्तु मेरे प्रश्नों के विषय में
भी इस बात को स्वीकार करते हैं? तो बस 'नही' के अतिरिक्त और क्या उत्तर मा बयोंकि यह सारा वखेड़ा तो अपना
यड़पन दिखाने और झूठ-मूठ का यश लटने के अभिप्राय से था। शास्त्रार्थ से तो पूर्णतया इन्कार ही था । जव स्यामा ।
न पादरी साहब का अन्तिम 'नही' का उत्तर सुना तो यह कहा कि पादरी साहब आप न्याय से काम बिलकुल नहीं लेते,
केवल शास्त्रार्थ का नाम करते हैं परन्तु आप की यह चतुराई कि कही पोल न खल जाये, व्यर्थ गई और आप सारी
वास्तविकता प्रकट हो गई क्योकि आप उन नियमों को जो शास्त्रार्थ में आवश्यक होते है. स्वीकार नहीं करते और न दूसर
की सुनना चाहते हैं। देखो, में पहले भी कह चुका है और फिर भी कहता है कि प्रधम आप वेद पर एक से लेकर दस तक
आप कीजिये और मुझ से उत्तर लीजिये और तत्पश्चात् मुझको अपनी इजौल पर आद्षेप करने दीजिये और उत्तर प्रदान
कीजिये और जब आप मेरे आदेशों का उत्तर दे सके तो फिर आप चाहे और नये दस प्रश्न मन पर कीजिय, चाह अपने
पहले दस प्रश्नों में से यदि किसी में कोई संदेह,रोषरहे ऊऔर मेरे उत्तर से इच्छानुसार सन्तोष न हो तो वह पछिये और फिर
उत्तर सुनिये ताकि सभा में उपस्थित लोग भी जान ले कि सत्य क्या है और असत्य क्या है ? साराश यह कि जब पादरी
साहब के पास कोई और बहाना अवशिष्ट न रहा तो यह कहा कि या तो आप केवल मेरा ही सन्तोष कीजिये और अपने
आसमा को रहने दीजिये अन्यथा में जाता हूं, आप बैठे रहिये । इस पर स्वामी जी ने कहा कि पादरी साहब इस सभा में
उपस्थित लोग तो आप के बार-बार भागने और किसी शर्त पर न जमने से भली भांति जान ही गये हैं कि आप इलि पर
आप होने से थरथर कांपते हैं और पीछा छुड़ाने के लिए बार-बार कुदते-फांदते फिरते हैं। खैर, अब आप जाने और
आपका काम । अच्छा तो यही था कि आप शास्त्रार्थ करते और अपने जी की भड़ास निकाल लेते। यह सुनकर पादरी साहब
ने कठोर शब्दों में कहा कि बस आप उत्तर देते ही नहीं, मैं जाता हूं। मझे काम है। इस पर स्वामी जी ने भी कहा कि आप
प्रश्न का उत्तर लेते ही नहीं क्योंकि आपका प्रयोजन तो कुछ और ही है, शास्त्रार्थ का तो केवल नाम है। अच्छा जाइये मुझ

को इस समय काम है।

विचारणीय बात है कि ऐसी कार्यवाहियों से भला कभी शास्त्रार्थ होने की सम्भावना रहती है और कही इस प्रकार
सत्यासत्य का विवाह हो सकता है? कदापि नहीं। यह बात किसी को स्वीकार नहीं होसकती कि हम तो आक्षेप करे और
सरे को आक्षेप करने न दे। अपनी कहे, दूसरे की न सुने । परन्तु वास्तविकता तो यह है कि जिस बात से किसी का सिद्धान्त
र्वल होता है उसको स्पष्ट करने का वार्तालाप करने के लिए कौन उद्यत हो सकता है ! और जो पुस्तक आदि से अन्त क
क्षेप के योग्य हो, उस की निर्दोषता पर शास्त्रार्थ करना कौन स्वीकार कर सकता है? यदि आक्षेप करने वालों की धार्मिक
नको सच्ची और आक्षेप योग्य बातों से रहित होती तो क्यों इस अभिप्राय से कि इन पर शास्त्रार्थ न हो इतना छल-कपट
या जाता और वीडियो प्रकार की बनावट बनाई जाती । यही न मान लेते कि बहुत अच्छा, पहले आप प्रश्न कीजिए

Thomas

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