आर्यसमाज दानापुर(aryasmaj Danapur)part5

मंडन देखकर पूछा, 'जोशी जी की क्या दशा है ?' में रो पड़ा। महाराज ने खेद प्रकट किया और मझे आश्वासन देकर कहा
कि हम यहां नहीं ठहरेंगे और उसी समय सेवक को कहा कि अजमेर का टिटि ले आओ और वचन दिया कि दोनों टाकुरों
से कह देना कि हम आते समय तुम से मिलकर जावेंगे । उस समय अजमेर की ओर चले गये।

लगभग डेढ़ मास पश्चात लौटते हुए पधारे और ढढोर के योग में डेरा किया । टाकुर रघुनाथसिंह जी और हम
दोनों गये । प्रार्थना की कि आप अपने बाग में चलिये । कहा कि यही स्थान श्रेष्ठ है, यह टिकेगे। रोई आदि का प्रबन्ध
कर दिया गया और वहीं रहे ।"

कोहिनूर' में लिखा है-*१४ दिसम्बर, सन् १८७८ को दयानन्द सरस्वती जी जयपुर मे प्रविष्ट हुए ; वे बान
ढा में ठहरे हुए हैं। बहुत से लोग उनके पास आते जाते हैं परन्तु महाराजा साहब बहादुर से अभी भेट नहीं हुई और इसी
कारण कोई सभा भी अभी तक नहीं हुई। (२५ दिसम्बर, सन् १८७८, पृष्ठ १०७२, कालम २, खंड ३०, संख्या ५५)।

जोशी जी कहते हैं, "तत्पश्चात् पंडित लोग वहां जाते रहे और प्रश्नोतर करते रहे। हमने प्रार्थना की कि एक दिन
हमारे यहां व्याख्यान दीजिये। उन्होंने स्वीकार किया और उसी दिन सायंकाल उनके व्याख्यान का महलों में प्रबन्ध किया
और अपने परिचितों को सूचना दी गई। वेद विषय पर ८ बजे रात से ९ बजे व्याख्यान हुआ। इस पर महाराजा
माधोसिंह जी की कुछ प्रसन्नता विदित हुई। इस बार कुल दस दिन रहे ।"
शिवनारायण जी वैद्य ने कहा "इस बार ठाकुर रघुनाथ सिंह और रावल विजयसिंह ने महाराजा साहब से
(स्वामी जी की) प्रशसा की वि एक बहुत उत्तम साधु आये है, श्रीमान् को अवश्य मिलना चाहिये । तिस पर श्रीमान ने जाने
का निश्चय किया, परन्तु किसी की शरारत अथवा स्वयमेव सरकारी विदूषक पुरन्दर ब्राह्मण वहां आया और उसने कहा
कि महाराज ! उनसे न मिलना चाहिये, वे तो ईसाई है। राजा ने कहा कि हमारी इसमें क्या हानि है? हम तो अंग्रेजों से
मिलते हैं, क्या उनसे मिलने पर हम ईसाई हो जायेंगे? इस पर पुरन्दर ने कहा कि ब्रह्मचारी जी अप्रसन्न होंगे। यह बात
शंकर महाराजा नहीं गए । मैंने स्वामी जी से चर्चा की कि इस प्रकार पुरन्दर ने महाराजा का मन बिगाड़ा कहा कि मुझे
तो केवल ब्राह्मणों की भलाई के लिए ही मिलना था; अन्यथा मेरा कोई निजी प्रयोजन नहीं है। पीछे पुरन्दर भी पछताया
था।"

'भारत सदशा प्रवर्तक' पत्रिका में लिखा है—“१५ दिसम्बर, सन् १८७८ स्वामी जी जयपुर में आकर सांगानेर
दरवाजे के बाहर ढड़े के बाग में ठहरे। वहां उन के निवासस्थान पर ही सब लोग सायंकाल को आते और अपनी-अपनी
बुद्धि के अनुसार प्रश्न उत्तर कर जाते । महाराजा साहब के दीवान श्रीयुत ठाकर फतहसिह जी मुसाहब अवरील के सरदार
ठाकुर लक्ष्मण सिंह जी, उनके छोटे भाई ठाकुर रघुनाथ सिंह जी और बाबू श्रीप्रसाद आदि सभी प्रतिष्ठित पुरुष आते रहे।
तीन दिन तक ठाकुर लक्ष्मण सिंह जी की हवेली पर वेद आदि सत्यशासों के विषयों पर व्याख्यान हए। जयपुर में भी पोप
लोगों ने एक विचित्र लीला की कि विद्यार्थियों को बुलाया और उनको प्रश्न लिख-लिख कर दिये और कहा कि जाओ
स्वामी जी से उत्तर मांगो । जब स्वामी जी के पास जाकर उत्तर चाहते, तब स्वामी जी उनसे कहते कि यदि ये प्रल तुम्हारे
हैं तो हम उत्तर नहीं देंगे। हमारे शिष्यों से उनके उत्तर पूछ लो । यदि वहा शंका-निवारण न हो तो हमारे पास आना। और,
यदि तुम्हारे गुरुओं के ये प्रश्न हैं तो हम उत्तर देंगे। पोपों ने टडी की ओट में शिकार मारना चाहा परन्तु स्वामी जो ऐसे
विद्यार्थियों के साथ अपना अमूल्य समय क्यों खोते ? लोगों का विचार स्वामीजी को एक-दो मास ठहराने का था परन्तु
स्वामी जी वहां दो कारणों से अधिक न ठहरे। एक तो यह कि जयपुर के लोग दिन भर स्वामी जी के पास बैठे रहते इस
कारण उनका वेद भाष्य बनाने का काम नहीं हो सका। दस दिन वहां रहे और बहुत थोड़ा काम हुआ। दूसरे, स्वामी जी को
हरिद्वार के मेले पर जाना आवश्यक था इसलिए जयपुर में दस दिन रहकर रिवाड़ी पधारे ।(सन् १८८२, पृष्ठ २५, २६,
संख्या

Thomas

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