आर्यसमाज दानापुर(aryasmaj Danapur)part4

कहा गये । एक दिन स्टेशन के डाक बंगले पर ठहर कर रतलाम को चले गए। अपने एक पत्र में लिखते हैं-आज हम
इंदौर से दो बजे की गाड़ी में बैठकर रतलाम जाएंगे। वहां से उदयपुर जाने का विचार है।* श्रावण बदि ५, बुधवार,
तदनुसार ५ जुलाई, सन् १८८२ । -दयानन्द सरस्वती, इंदौर।।
रतलाम-स्वामी जी ५ जुलाई २२ सन् १८८२ को इन्दौर से रतलाम आये और ८ जुलाई तक वहां विराजमान
रहे। स्वामी आत्मानंद जी भी उनके साथ थे। मालवा नवाब जावरा (इन्दौर प्रदेश) स्वामीजी स्वामी आत्मानन्दजी
सहित रतलाम से चल कर उसी दिन जावरा में आ गये और स्टेशन पर ठहरे। वहां से उदयपुर पत्र भेजा कि हम श्री महाराणा
को दिये हुए अपने वचनानुसार आते हैं। आप सवारी आदि का प्रबन्ध कर के हम को सूचित करें ।"

१४ जुलाई, सन् १८८२ को उदयपुर का पत्र मिला कि हमने चित्तौड़गढ़ के प्रशासक के नाम मियाना, रथ, गाडी
आदिवासियों के लिए आज्ञा भेज दी है। यथावत् प्रबन्ध ो जावेगा आप पधारिये । इस चिट्ठी के आने पर स्वामी जी ने
आत्मानन्द सरस्वती जी को भेजा कि वह आगे जाकर देखें कि प्रबन्ध हो गया है या नहीं और पत्र लिखें ताकि हम को वहां
विलम्ब न हो । प्रशासक चूकि दौरे पर गया हुआ था इसलिए विलम्ब हुआ और २३ को आत्मानन्द जी का पत्र आया कि
से
प्रशासन आ गया है, सब प्रबंध हो गया है, आप पधारें फिर स्वामी जी २ ज़लाई, सन् १८८२ को वहां चलकर २५
को चित्तौड़गढ़ पधारे ।

अध्याय ४
देशी रियासतों और रजवाड़ों में धर्मोपदेश

प्रथम परिच्छेद
सनातन-धर्मियों से शास्त्रार्थ
रियासत जयपुर

प्रथम बास्-आर्यसमाज की स्थापना से पहले स्वामी जी कई बार इस रियासत में पधारे और ठाकुर रणजीतसिंह
जी रईस अचरोल, आदि रईस का धर्मोपदेश दिया परन्तु आर्य समाज-स्थापना का क्रम आरम्भ करने के पश्चात् यह पहला
अवसर था कि ठाकुर साहब ने स्वामी जी को लाने के लिए जोशी रामरूप' को दिल्ली भेजा क्योंकि वे एक यज्ञ का आयोजन
कर रहे थे । जोशी जी स्वामी जी से मिलकर और उनको जयपुर पधारने के लिए तैयार करके स्वयं पहले चले आये । उन
का कथन है-"मेरे दिल्ली से लौटने से पहले ही सरदार साहब के शरीर में कुछ आक्षेप (विकार) हो रहा था परन्तु उन्होंने
यज्ञ की सामग्री एकत्रित करने की आज्ञा दी। मैंने निवेदन किया कि अष्टमी का मुहूर्त ठीक नहीं प्रतीत होता, कोई और होना
चाहिये । मैं किसी और अच्छे मुहूर्त की खोज कर रहा था, इतने में सरदार साहब का दख बढ़ने लगा और कार्तिक शुक्ला
१० सोमवार, संवत् १९३५; तदनुसार, ३ नवम्बर सन् १८७८ को सरदार साहब का शरीरपात हो गया ।'
(किसी बुद्धिमान ने सत्य कहा है "एक घड़ी में घर जले और नौ घड़ी भद्रा" जोशी जी का मुहूर्त ही न बना और
सरदार साहब स्वर्गवासी हो गये-संकलन कर्ता) ।

उनका शरीर पर होने के चौथे दिन, ७ नवम्बर, सन् १८७८ को स्वामी जी दिल्ली से पधारे । सरदार साहब की
गद्दी पर उनके पुत्र ठाकुर लक्ष्मण सिंह और उनके छोटे भाई रघुनाथसिंह जी थे। मैं गाड़ी लेकर स्टेशन पर पहुंचा। मेरा

Thomas

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