आर्यसमाज दानापुर(aryasmaj Danapur)part3

इस बार कई सम्मानित रईस इस प्रतीक्षा में रहे कि यदि स्वामी जी कहें तो हम बड़ी भारी धनराशि मन्दिर के फंड
के लिए देखें परन्तु स्वामी जी ने अपने मुख से कुछ न कहा। केवल इतना ही कहा कि यह काम मेरा नहीं है, मैं केवल
उपदेशक हूं । क्या देना और क्या लेना यह काम तुम्हारा और उनका है।

दक्षिण भारत से भी आमन्त्रण-सन्देश मिला था और इसी प्रकार काठियावाड़ गुजरात से भी, परन्तु अबकाश न
होने के कारण स्वामी जी वहां न गये और यहां के सभासदों और सहायकों के अधिक अनरोध पर २२ जून तक बम्बई में
रहे और २३ जून सन् १८८२ को वहां से खंडवा की ओर चले गए। समाज के समस्त सम्मानित सदस्य तथा नगर
के अन्य धर्मरुचि रईस स्टेशन पर पहुंचने आये और प्रेमपूर्वक परस्पर नमस्ते कहकर विदा हुए।

जब स्वामी जी बम्बई में ही विराजमान थे और बड़ी प्रबलता से मूर्तिपूजन आदि विषयों का खंडन कर रहे थे तो
आर्यसमाज के योग्य और सम्मानित सभासद् सेठ मथुरादास लोजी भाटिया बम्बई निवासी ने यह विज्ञापन
दिया-'मूर्तिपूजकों के लिए पारितोषिक जो मनुष्य मूर्तिपूजन को शास्त्रविहित (वेदोक्त) कर्म निश्चय कर देगा उस को मैं
पांच हजार रुपया पारितोषिक दूंगा ।' मई मास, सन् १८८२। विज्ञापक-बम्बई निवासी मथुरादास लोजी भाटिया।

लाहौर के समाचार पत्र 'आफताबे पंजाब' ने इस समाचार को मुंबई के अंग्रेजी समाचारपत्रों से लेकर प्रकाशित
किया। इस पर 'विक्टोरिया पेपर'—सियालकोट लिखता है "हमें चाहिये चिड़ियों का दूध*,'आफतावे पंजाब' लाहौर
के कथनानुसार बम्बई के एक धनवान भाटिया ने पांच हजार रुपये उस पंडित को दान देने किये हैं जो सिद्ध के कि वेद व
शास्त्र मूर्ति पूजा की आज्ञा देता है ।'
'विक्टोरिया पेपर सम्मति देता है-"मैं डंके की चोट से कहता हूं कि वेद शास्त्र ईश्वरोपासना की आज्ञा देते हैं,
न कि मूर्तिपूजा की । पंडित क्यों झगड़ते हैं ? अनुचित हठ न करें ।"(प्रकाशित द्वितीय सप्ताह, जुलाई, सन् १८८२,तृतीय

भाग, पृथ्ट)

फिर यही समाचार 'आर्य दर्पण'-शाहजहांपुर में प्रकाशित हुआ और उससे लेकर देशहितैषी' अजमेर लिखता
है-“आर्य लोग इन दिनों अपने धर्म के जीर्णोद्धार में बड़े तत्पर हो रहे हैं। एक गुरु कहता है कि वेदान्त में मूर्तिपूजा का
निषेध है। दूसरा उसके विरुद्ध उपदेश करता है। इस कारण महाशय मथुरादास लोजी भाटिया, जो एक विद्वान् सज्जन
पुरुष हैं, पांच हजार रुपये उस मनुष्य को पारितोषिक देना स्वीकार करते हैं जो मूर्तिपूजन को शास्रविहित निश्चय करा देवे ।
मूर्तिपूजकों को इस पर अवश्य उद्योग करना चाहिये ।”(देशहितैषी' अजमेर, खंड ४, संख्या ७, क्रम संख्या ४३, कालम
१, पृष्ठ २०, जनवरी, सन् १८८३)
| बम्बई–स्वामी जी १ जनवरी, सन् १८८२ से २३ जून, सन् १८८२ तक बम्बई में रहे और २४ जून को वहां से
(१८
चलकर रेल द्वारा खंडवा' * पहुंचे । वे स्वयं एक चिट्ठी में लिखते हैं-=खंडवा "ला० कालीचरण रामचरण आनन्दित
रहो । विदित हो कि हम सुखपूर्वक बम्बई से खंडवा में आ गये हैं। यहां रा० रा० * ऐभाऊ टाटा जी के बगीचे में ठहरे
हैं। २५ जून, सन् १८८२।(दयानन्द सरस्वती, खंडवा) और एक पत्र ३ जुलाई, सन् १८८२ का भी । इसलिए ३ जुलाई २०
तक खंडवा में रहे।'

इन्दौर-४ जुलाई को खंडवा से चलकर इन्दौर में विराजे। चूंकि महाराज तगोराव २५ जी होल्कर स्वामी जी
के बड़े श्रद्धालु थे और उनसे प्रेम रखने वाले थे। उन्होंने उनको कई बार पहले भी बुलाया था परन्तु वे स्वामी जी से मिले
नहीं थे क्योंकि उस अवसर पर महाराजा साहब राजधानी में नहीं थे। इसलिए यह समाचार सुन स्वामी जी इन्दौर की

Thomas

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