आर्यसमाज दानापुर(aryasmaj Danapur)part2

ने कहा कि अब तुम्हारा चिन्ता करना सर्वथा मूर्खता है, तुम्हें पेंशन मिलती है वह तुम्हारे लड़कों के पालन के लिए पर्याप्त
है । बस अब तुम चूंकि ब्राह्मण देश में उत्पन्न हुए हो और तुम्हारे पूर्वज जगत्-गुरु कहलाते थे, तुम्हें उचित है कि तम भी
अब जगत् के उपकार के लिए कमर कस लो। तम कोल-भीलों के देश में चले जाओ और उनको ईसाई होने से
रोको। किसी प्रकार से जैसे तुम्हारा चित चाहे, उनको एक ईश्वर की पूजा सिखलाओ या कोई जाप बताओ परन्तु क्रिस्तान
होने से बचाओ ।' परन्तु उसने न माना। उन दिनों बहत से पादरी, नगरों को छोड़कर कोलो-भीलों तथा जंगलियों को
क्रिस्तान बनाने के लिए (गांवों में) गये हुए थे। उसने कछ उत्तर न दिया। स्वामी जी ने बहुत ललकारा परन्तु वह न बोला
और उस बात को न माना । हम ८-१० दिन बम्बई में रहे । हस्ताक्षर-अंग्रेजी में लेखक जनकधारीलाल ।

स्वामी जी की उपस्थिति में ही सामाजिक पुरुषों के धार्मिक उत्साह के वशीभूत हो, सदस्यों ने केवल व्याख्यान
सुनने के लिए तथा पुस्तकालय और शाला बनाने के लिए पांच ट्रस्टी नियत करके एक हजार गज भूमि का एक टुकड़ा
मोल लिया जो गिरगांव, पुलिस कोर्ट के पीछे काकडवाडी नाम से प्रसिद्ध है और इसी स्थान पर अव आर्यसमाज का भब्य
मन्दिर कई हजार रुपये की लागत से बनाया गया है।

आर्यसमाज के नियमों और उपनियमों के संशोधन का वृत्तान्त
स्वामी जी जब पहली बार यहां आये थे तब नियमोपनियम बड़े विस्तारपूर्वक बनाये गये थे और अभी तक
समाज उन्ही पुराने नियमों के अनुसार चलता था। तीसरा 'समाज' लाहौर में स्थापित हुआ तो वहां पर उन नियमों को
संक्षिप्त करके स्वामी जी की सम्मति से वर्तमान दस नियम बनाये गये जो तत्पश्चात् सब समाजों को छपवा कर भेजे जाते
रहे।

अब इस बार स्वामी जी की उपस्थिति में ही बम्बई में नियम और उपनियमों के संशोधन के सम्बन्ध में भी विचार
उत्पन्न हुआ। ८ अप्रैल, सन् १८८२ की रात को स्वामी जी की उपस्थिति में 'आर्यसमाज' की अन्तरंग सभा हई इसमें
पुराने नियम और उपनियमों के सम्बन्ध में संसद की ओर से बहुत विचार हुआ और सब आर्यसमाजों का उद्देश्य एक
करने के लिए सर्वसम्मति से यह निश्चय हुआ कि जो नियमोपनियम स्वामी जी की सम्मति से लाहौर आर्यसमाज ने सब
स्थानों के आर्यसमाजों के लिए छपवा कर प्रसिद्ध किये हैं, उन्हें बम्बई आर्यसमाज अंगीकार करे और इस स्वीकृति के
निमित आर्य समाज की साधारण सभा का अधिवेशन किया जाये।

इस निर्णय के अनुसार १५ अप्रैल, सन् १९९२ की रात को बालकेश्वर में महापंडित' * की उपस्थिति में साधारण
सभा का अधिवेश किया गया उसमें सर्वानुमति से वह प्रस्ताव पास हुआ और स्वामी जी की सम्मति से प्रत्येक स्थान के
समाजों के लिए लाहौर आर्यसमाज ने जो नियमोपनियम छपवा कर प्रसिद्ध किए हैं, यथार्थ होने से उन्हें स्वीकार किया
गया। परन्तु साथ ही यह भी निश्चय हुआ कि बम्बई के स्थानीय समाज' के लिए उनका देश काल के अनुकूल होना
आवश्यक है। यह भी निश्चय हुआ कि यदि उपनियमों में फेरफार करने और न्यूनाधिक करने की कछ आवश्यकता न ही।
तो वे विशेष उपनियम वर्तमान उपनियमों की पूर्ति करेंगे। इस पर विचार करने के लिए निम्नलिखित सज्जनों की उपसमिति
बना दी गई-१. रावबहादुर गोपालराव हरि देशमुख । २. राजमान्य राजश्री आत्माराम बापू दलवी । ३. राजमान्य
राव बहादुर इच्छाराम भगवानदास बी० ए० । ४. राजमान्य सेवालाल कृष्णदास । ५. प्राणजीवनदास काहनदास । इस
समिति ने वहां के लिए उपनियमों में थोड़ा परिवर्तन कर लिया है ।

Thomas

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