आर्यसमाज दानापुर(aryasmaj Danapur)

का आदेश है और वह विवादास्पद है,हमको इस से भिन्न कोई उपाय बतलाइये; क्योकि पंडित जी पहले
एक मुकदमे में झूठी साक्षी दे चुके थे और एक बार फिर देनी थी; अत: दी
आर्यसमाज दानापुर के अन्य सदस्यों को स्वामी जी ने कहा कि तम हमसे कई प्रश्न पछने के लिए आये हो। ये
प्रश्न तुम को (एक साथ) याद न आयेगे, एक कागज लेकर जब-जब याद आते जायें लिखते जाओ ।वास्तविक बात यह
है कि बाबू जनकधारीलाल केवल प्रश्न पूछने के लिए ही गये थे और जब कागज लेकर लिखने लगे तो उस समय जो-प्रश्न
में उठता था, उस का उत्तर अपने ही जी से मिल जाता था। दूसरे समय जब स्वामी जी ने कहा कि कहो, क्या पूछना।
को
३7मूझ जनकधारीलाल कुछ सोचने की बात शेष न रही, केवल यही पछा कि परमेश्वर की उपासना किस रीति से
नी चाहिए? स्वामी जी ने कहा कि हमने तुम्हें और तुम्हारे कई साथियों को एक दिन जोन्स साहब के बंगले पर इसकी
विधि बतला दी थी। मैंने उत्तर दिया कि अपने जैसे बतलाया था वैसे ही में किया करता है। स्वामी जी ने कहा कि तुम
ीं करते हो, मेरे सामने करो । मैंने प्राणायाम करना आरम्भ किया। स्वामी जी ने कहा कि यह प्राणायाम न हुआ क्योंकि
अब तुम भीतर से वायु बाहर फेंकते हो तो चाहिये कि गुदेन्द्रिय ऊपर को उठ जाये सो तुमसे नहीं होता, अब यूं ही करो।
फिर हमने पूछा कि इस उपासना के करते समय मन इधर-उधर चला जाता है. इसका क्या उपाय करे ? स्वामी जी ने कहा
कि इसको एक स्थान पर ठहरा लो । मैंने कहा कि कैसे रूप का ध्यान करके उस पर ठहरावे ? स्वामी जी ने कहा कि रूप
की कोई आवश्यकता नहीं। हमने कहा कि बिना रूप के ठहरता नहीं । कहा कि असंग्रज्ञात योग' में रूप की कोई
आवश्यकता नहीं है। परन्तु यदि तुमसे यह नहीं हो सकता तो अपने शरीर के भीतर किसी स्थान की कल्पना कर लो और
वहां एक सुई की नोक के समान या तिल समान किसी वस्तु का ध्यान करो और फिर ध्यान में ही उसके दो टुकड़े कर डालो
और उस आधे टुकड़े पर ध्यान जमाओ । फिर उसके भी दो टुकड़े कर डालो और उस पर ध्यान जमाओ इसी प्रकार निरन्तर
ध्यान में उसे छोटा करते चले जाओ जब तक कि वह अत्यन्त छोटी से छोटी मात्रा पर न पहुंच जाये । फिर उसे भी उड़ा दो,
इतने में तुम्हारी धारणा हो जायेगी । अब समाधि का वृत्तान्त बतलाते हैं। हमने कहा कि बस इतना ही रहने दीजिये। जब
इतना अभ्यास हो जायेगा तब फिर मैं आप से पत्र द्वारा पूछ लूंगा।स्वामी जी ने कहा कि मैं पत्र का उत्तर न दे सकूंगा मेंने
कहा कि जब उस ओर समीप आवेंगे तो मैं स्वयं आकर मिलूंगा स्वामी जी मौन हो गये, फिर कछ न बोले।

दूसरे दिन संध्या के समय बम्बई का एक सेठ अपने दस-ग्यारह वर्ष के लड़के को लिए हुए स्वामी जी के
दर्शनार्थ आया । नमस्ते होने के पश्चात् स्वामी जी लड़के से बात करने लगे। लड़का बड़ा लजीला था, कई एक उपाय
करके स्वामी जी ने उसे बुलाया । अन्त में उसे कुछ उपदेश देने लगे। उस लड़के से कहा कि प्रात:काल उठकर मुंह-हाथ
धो कर अपने मां-बाप से नमस्ते करो और जब पाठशाला को जाने लगो तो अपनी पुस्तक अपने हाथ में लो, न कि नौकरों
के हाथों में। इसी प्रकार बहुत-सी शिक्षाओं के बीच यह भी कहा कि तुम किसी स्ी के मुख की ओर ध्यानपूर्वक मत ताको
और जब कोई आंख के सामने आये तो अपनी दृष्टि फेर लो नहीं तो उसकी आकृति तुम्हारे मन में घुस कर एक प्रकार की
उत्तेजना उत्पन्न करेगी ओर उसका परिणाम यह होगा कि तुम को धातुक्षीणता का रोग हो जायेगा जिससे तुमको बहुत हानि
होगी ।

एक दिन एक मनुष्य स्वामी जी के दर्शनों के लिए आया। स्वामी जी ने पूछा कि तुम कौन हो ? उतर दिया कि
ब्राह्मण।स्वामी जी ने पूछा कि क्या काम करते हो? कहा कि में पहले सरकारी नौकर था, अब पेंशन पाता है। स्वामी जी
ने कहा कि कुछ संस्कृत भी जानते हो ? उसने कहा कि अपना साधारण क्रिया-कलाप जानता हूं । कहा कि तब तुम उपदेश
क्यों नहीं करते ? उसने कहा कि क्योंकर उपदेश करू, यहां दिन रात लड़के-बालों की चिन्ता में पड़ा रहता हूँ। स्वामी

Thomas

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